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#culture तीजा तिहार: कल करू भात खाकर आज सुहागिनों ने रखा तीजा व्रत, जानिए पूजा विधि और महत्व

#culture तीजा तिहार: कल करू भात खाकर आज सुहागिनों ने रखा तीजा व्रत, जानिए पूजा विधि और महत्व

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भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरितालिका तीजा का पर्व इस बार 12 सितंबर को मनाया जा रहा है। मनभावन पति के लिए कुंवारी कन्याएं और अखंड सौभाग्य के लिए सुहागन महिलाएं बड़े उत्साह से यह व्रत रखती हैं। छत्तीसगढ़ में तीजा का पर्व काफी माना जाता है। तीजा के लिए मायके से भाई या पिता अपनी बेटी के ससुराल जाकर तीजा मनाने का न्योता देकर उसे मायके ले आता है। सुहागन महिलाएं तीजा का व्रत अपने मायके में रहकर करती हैं। बेटी को मायके आने का न्यौता देने के अलावा तीजा के लुगरा, कडु भात खाना, हाथों में मेहंदी लगाना, तीजा के दिन निर्जल व्रत रखना, शाम को फुलेरा सजाना, प्रदोष काल में पूजा करना, रात्रि जागराण करना और ठीक अगले दिन चतर्थी को सुबह विसर्जन करने के बाद तिखूर खाकर व्रत तोड़ने की परंपरा बहुत ही अनोखी है। अन्य राज्यों की अपेक्षा छत्तीसगढ़ में तीजा का महत्व कुछ अधिक है। न्यौता मायके से, लिवाने सस
#culture तीजा के तीज सुहागन महिलाओं का त्यौहार, जानिए पौराणिक कथा और महत्व

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सुहागिनें जहां अपने पति की लंबी आयु के लिए तीज का व्रत रखती हैं, वहीं अविवाहित लड़कियां अच्छा वर प्राप्त करने के लिए यह व्रत करती हैं। यूं तो हरतालिका तीज देश के कई राज्यों में मनाई जाती है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इस त्योहार का उत्साह दोगुना हो जाता है। मानसून के मौसम का स्वागत करने के लिए छत्तीसगढ़ और उत्तरी भारत में तीज त्योहार ('छत्तीसगढ़ी  में तीजा') मनाया जाता है। पति की लंबी उम्र की कामना और परिवार की खुशहाली के लिए सभी विवाहित महिलाओं में निर्जला उपवास रखती है (वे पूरे दिन पानी नहीं पीते हैं) और शाम को तीज माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा के बाद, वे पानी और भोजन लेती है। तीज के एक दिन पहले सभी महिलाये एक दूसरे के घर जाकर कड़वा भोजन (छत्तीसगढ़ी में 'करू भात') का सेवन करती है। करेले की सब्जी एवं अन्य व्यंजन बनाये जाते है।  यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया (भादो की शुक्ल पक्ष क
#culture बैलो के श्रृँगार व गर्भ पूजन का पर्व है पोला, जानिए पूजन विधि, महत्व और पौराणिक कथा

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किसी भी राज्य की सार्थक पहचान उनकी संस्कृति से होती है। जिसमें छत्तीसगढ़ राज्य भारत देश का एक मात्र ऐसा राज्य है जो पूर्णतः कृषि कार्य प्रधान राज्य है। यहाँ के निवासी पूरे वर्ष भर खेती कार्य मे लगे रहते है। धान की खेती यहाँ की प्रमुख फसल है। यहाँ के निवासियों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को कुछ इस तरह संजोकर रखा है, कि कृषि कार्यो के दौरान साल के विभिन्न अवसरो पर- खेती कार्य आरंभ होने के पहले अक्ती, फसल बोने के समय सवनाही, उगने के समय एतवारी-भोजली, फसल लहलहाने के समय हरियाली, आदि आदि अवसरो व ऋतु परिवर्तन के समय को धार्मिक आस्था प्रकट कर पर्व-उत्सव व त्योहार के रूप मे मनाते हुए जनमानस मे एकता का संदेश देते है। यहाँ के निवासी, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं तथा प्रकृति को भी भगवान की ही तरह पूजा करते है। बैलो के श्रृँगार व गर्भ पूजन का पर्व-पोला पोला पर्व के अवसर पर तरह तरह के व्यंजन बनाए जाते है
#culture आज माताएं रखेंगी कमरछठ उपवास, जानिए पूजा विधि

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रायपुर | छत्तीसगढ़ का लोकपर्व हलषष्ठी (कमरछठ) यह पर्व माताओं का संतान के लिए किया जाने वाला, छत्तीसगढ़ राज्य की अनूठी संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जिसे हर वर्ग, हर जाति मे बहूत ही सद्भाव से मनाया जाता है। हलषष्ठी को हलछठ, कमरछठ या खमरछठ भी कहा जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। संतान प्राप्ति व उनके दीर्घायू सुखमय जीवन की कामना रखकर माताएँ इस व्रत को रखती है। इस दिन माताएँ सूबह से ही महुआ पेड़ की डाली का दातून कर, स्नान कर व्रत धारण करती है।भैस के दुध की चाय पीती है।तथा दोपहर के बाद घर के आँगन मे, मंदिर-देवालय या गाँव के चौपाल आदि मे बनावटी तालाब (सगरी) बनाकर , उसमें जल भरते है।सगरी का जल, जीवन का प्रतीक है। तालाब के पार मे बेर, पलाश,गूलर आदि पेड़ों की टहनियो तथा काशी के फूल को लगाकर सजाते है।सामने एक चौकी या पाटे पर गौरी-गणेश, कलश रखकर हलषष्ठी देवी
#foodrecipe जानिए छत्तीसगढ़ का फेवरेट नाश्ता “फरा” बनाने की विधि

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हमारा छत्तीसगढ़ धन का कटोरा है। यहाँ चावल की कई प्रजाति उगाई जाती है। उसी तरह यहाँ चावल को कई तरह की डिश बनाकर खायी जाती है। हम आपको फरा बनाने की विधि बता रहे है।  इसे पके हुए चावल (भात) और चावल के आटे से बनाया जाता है। फरा बनाने के लिए सामग्री 1. उबला चावल (भात) - 1 कटोरी 2. चावल का आटा - 2 कटोरी 3. खड़ा तिल - 2 चम्मच 4. खड़ा लाल मिर्च - 1-2 कलियाँ 5. मीठी पत्ती - थोडा सा 6. नमक - स्वादानुसार 7. तेल - तलने के लिए (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); बनाने की विधि 1. सबसे पहले भात और चावल आटे को पानी मिलाकर गूंध ले। 2.अब इस गूंधे हुए आटे की छोटी छोटी लोई लेकर उसे पतली बत्ती की तरह बना ले। 3. अब एक कढ़ाई में तेल गरम करे। 4. उसमे तिल, मीठी पत्ती और मिर्ची डालकर तड़का लगाए। 5. अब उसमे पानी (आवश्यकतानुसार उतना पानी डाले जितने में फरा डूब जाये) डाल दे। बनाये हुए फरे को उ
#culture पाट जात्रा रस्म के साथ ही शुरू हुआ बस्तर दशहरे की तैयारियां

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बस्तर | बस्तर दशहरे की शुरुआत श्रावण (सावन) के महीने में पड़ने वाली हरियाली अमावस्या यानि के हरेली से होती है। इस दिन रथ बनाने के लिए जंगल से पहली लकड़ी लाई जाती है।  इस रस्म को पाट जात्रा कहा जाता है। यह त्योहार दशहरा के बाद 75 दिनों तक चलता है और अश्वनी के महीने में शुक्ल पक्ष के 13 वे दिन मुरिया दरबार की रस्म के साथ समाप्त होती है। इस रस्म में बस्तर के महाराज दरबार लगाकार जनता की समस्याएं सुनते हैं। यह त्योहार देश का सबसे ज्यादा दिनों तक मनाया जाने वाला त्योहार है। दशहरे में बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की की विशेष पूजा की जाती है। उनके लिए यहां एक भव्य रथ तैयार किया जाता है, इस रथ में उनका छत्र रखकर नवरात्रि के दौरान भ्रमण के लिए निकाला जाता है। मान्यता है कि भगवान राम ने अपने वनवास के लगभग दस साल दंडकारण्य में बिताए थे। छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका प्राचीन समय में दंडकारण्य के रू
#culture पशुधन और कृषि औजारों की पूजा का पर्व हरेली आज

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किसान इस मौके पर हल की पूजा करते हैं और लोगों की नजरों से घर और पूरे परिवार को बचाए रखने दरवाजे पर नीम की पत्ती भी टांगते हैं। इस त्यौहार में छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति के सारे रंग दिखते हैं। रायपुर। सावन की रिमझिम फुहारों के बीच आज छत्तीसगढ़ का पहला लोक त्योहार हरेली मनाया जा रहा है। पशुधन और कृषि औजारों की पूजा-अर्चना के इस त्यौहार के साथ ही छत्तीसगढ़ में त्यौहारों की धूम शुरू हो जाती है। आज छत्तीसगढ़ के घर-घर में चीला-चौसेला बनेगा और महिलाएं सुबह घर की दीवारों पर गाय के गोबर से सुरक्षा रेखा बनाकर पूजा-पाठ होती है। किसान इस मौके पर हल की पूजा करते हैं और लोगों की नजरों से घर और पूरे परिवार को बचाए रखने दरवाजे पर नीम की पत्ती भी टांगते हैं। इस त्यौहार में छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति के सारे रंग दिखते हैं। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); आज के दिन पूजा-पाठ के बाद
#culture अच्छे फसल और स्वास्थ्य के लिए मानते है हरेली तिहार

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छत्तीसगढ़ में हरेली महोत्सव किसानों का महत्वपूर्ण त्योहार है। हरेली शब्द हिंदी शब्द 'हरियाली' से उत्पन्न हुआ है और इसका मतलब है कि वनस्पति या हरियाली। यह छत्तीसगढ़ के 'गोंड' जनजातीय का मुख्य रूप से महत्वपूर्ण त्योहार है यह त्यौहार हिंदू कैलेंडर के सावन (श्रावणी अमावस्या) महीने के अमावस्या के दिन मनाया जाता है, जो जुलाई और अगस्त के बीच वर्षा ऋतु में होता है। यह त्यौहार 'श्रावण' के महीने के प्रारंभ को दर्शाता है जो कि हिंदुओं का पवित्र महीना है। यह त्योहार पूरे दिन मनाया जाता है और किसी को भी कोई काम करने की अनुमति नहीं है। खेतों से संबंधित उपकरण और गायों की इस शुभ दिन पर किसान पूजा करते हैं ताकि पूरे वर्ष अच्छी फसल सुनिश्चित हो सके। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); घरों के प्रवेश द्वार नीम के पेड़ की शाखाओं से सजाए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में दवाओं के परंपरागत प्रैक्
#foodrecipe बनाये करौंदे की चटनी, चटपटे स्वाद के साथ सेहत भी

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बरसात के मौसम में आप सबने करौंदे की चटनी जरुर खाई होगी। कच्चे फलों का खट्टा और पके फलों का खट्टा-मीठा स्वाद हमने बचपन में जमकर लिया है।छत्तीसगढ़ में करौंदे की झाड़ियाँ बहुतायत में पाई जाती थी मगर दूसरे फलों के पौधे का साथ यह भी छत्तीसगढ़ में विलुप्ति के कगा़र पर खड़ी है।90 के दशक में छत्तीसगढ़ी परिवारों की बाड़ियों और खलिहानों में इसकी झाड़ियाँ आवश्यक रूप से रहती थी। करौंदा एक झाड़ी नुमा पौधा है। इसे अंग्रेजी में Cranberry  इसका वैज्ञानिक नाम कैरिसा कैरेंडस (Carissa carandus) है। करौंदे के फलों का उपयोग सब्जी और अचार बनाने में किया जाता है। यह पौधा भारत में राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हिमालय के क्षेत्रों में पाया जाता है।करौंदे की झाड़ियों में फूल आना मार्च के महीने में शुरू हो जाता है और जुलाई से सितम्बर के बीच फल पक जाता है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); करौंदे
#temple मनमोहक है बालोद का सिया देवी मंदिर और वॉटरफॉल

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छत्तीसगढ़ अंचल में दुर्ग संभाग के बालोद जिले, गुरुर तहसील से धमतरी मार्ग में ग्राम सांकरा (बालोद से 25 कि. मी. दूर ) से दक्षिण की ओर 7 कि. मी. कि दूरी पर देव स्थल ग्राम नारागांव स्थित हैं। शक्ति और सौन्दर्य का अनोखा संगम अपने अप्रतिम प्राक्रतिक सौन्दर्य से पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। सिया देवी झरना दंडकारण्य पर्वत से प्रारंभ होकर झलमला से होते हुए वन मार्ग में 17 कि.मी. की दुरी तय करती हैं। प्राक्रतिक जल प्रपात एवं गुफ़ाओ से आच्छादित नारागांव स्थित सियादेवी, आध्यात्मिक एवं पर्यटक स्थल के रूप में प्रसिद्ध हैं। वनाच्छादित यह पहाड़ी स्थल प्राक्रतिक जल स्त्रोतो के कारण और भी मनोहारी दिखाई पड़ता हैं। इस पहाड़ी पर दो स्थानों से जल स्त्रोतों का उद्गम हुआ हैं। पूर्व दक्षिण से आने वाला झोलबाहरा और दक्षिण पश्चिम से आने वाला तुमनाला का संगम देखते ही बनता हैं। (adsbygoogle = window.adsbygoogle ||