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#culture पशुधन और कृषि औजारों की पूजा का पर्व हरेली आज

#culture पशुधन और कृषि औजारों की पूजा का पर्व हरेली आज

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किसान इस मौके पर हल की पूजा करते हैं और लोगों की नजरों से घर और पूरे परिवार को बचाए रखने दरवाजे पर नीम की पत्ती भी टांगते हैं। इस त्यौहार में छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति के सारे रंग दिखते हैं। रायपुर। सावन की रिमझिम फुहारों के बीच आज छत्तीसगढ़ का पहला लोक त्योहार हरेली मनाया जा रहा है। पशुधन और कृषि औजारों की पूजा-अर्चना के इस त्यौहार के साथ ही छत्तीसगढ़ में त्यौहारों की धूम शुरू हो जाती है। आज छत्तीसगढ़ के घर-घर में चीला-चौसेला बनेगा और महिलाएं सुबह घर की दीवारों पर गाय के गोबर से सुरक्षा रेखा बनाकर पूजा-पाठ होती है। किसान इस मौके पर हल की पूजा करते हैं और लोगों की नजरों से घर और पूरे परिवार को बचाए रखने दरवाजे पर नीम की पत्ती भी टांगते हैं। इस त्यौहार में छत्तीसगढ़ की कृषि संस्कृति के सारे रंग दिखते हैं। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); आज के दिन पूजा-पाठ के बाद
#culture अच्छे फसल और स्वास्थ्य के लिए मानते है हरेली तिहार

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छत्तीसगढ़ में हरेली महोत्सव किसानों का महत्वपूर्ण त्योहार है। हरेली शब्द हिंदी शब्द 'हरियाली' से उत्पन्न हुआ है और इसका मतलब है कि वनस्पति या हरियाली। यह छत्तीसगढ़ के 'गोंड' जनजातीय का मुख्य रूप से महत्वपूर्ण त्योहार है यह त्यौहार हिंदू कैलेंडर के सावन (श्रावणी अमावस्या) महीने के अमावस्या के दिन मनाया जाता है, जो जुलाई और अगस्त के बीच वर्षा ऋतु में होता है। यह त्यौहार 'श्रावण' के महीने के प्रारंभ को दर्शाता है जो कि हिंदुओं का पवित्र महीना है। यह त्योहार पूरे दिन मनाया जाता है और किसी को भी कोई काम करने की अनुमति नहीं है। खेतों से संबंधित उपकरण और गायों की इस शुभ दिन पर किसान पूजा करते हैं ताकि पूरे वर्ष अच्छी फसल सुनिश्चित हो सके। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); घरों के प्रवेश द्वार नीम के पेड़ की शाखाओं से सजाए जाते हैं। छत्तीसगढ़ में दवाओं के परंपरागत प्रैक्
#foodrecipe बनाये करौंदे की चटनी, चटपटे स्वाद के साथ सेहत भी

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बरसात के मौसम में आप सबने करौंदे की चटनी जरुर खाई होगी। कच्चे फलों का खट्टा और पके फलों का खट्टा-मीठा स्वाद हमने बचपन में जमकर लिया है।छत्तीसगढ़ में करौंदे की झाड़ियाँ बहुतायत में पाई जाती थी मगर दूसरे फलों के पौधे का साथ यह भी छत्तीसगढ़ में विलुप्ति के कगा़र पर खड़ी है।90 के दशक में छत्तीसगढ़ी परिवारों की बाड़ियों और खलिहानों में इसकी झाड़ियाँ आवश्यक रूप से रहती थी। करौंदा एक झाड़ी नुमा पौधा है। इसे अंग्रेजी में Cranberry  इसका वैज्ञानिक नाम कैरिसा कैरेंडस (Carissa carandus) है। करौंदे के फलों का उपयोग सब्जी और अचार बनाने में किया जाता है। यह पौधा भारत में राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और हिमालय के क्षेत्रों में पाया जाता है।करौंदे की झाड़ियों में फूल आना मार्च के महीने में शुरू हो जाता है और जुलाई से सितम्बर के बीच फल पक जाता है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); करौंदे
#temple मनमोहक है बालोद का सिया देवी मंदिर और वॉटरफॉल

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छत्तीसगढ़ अंचल में दुर्ग संभाग के बालोद जिले, गुरुर तहसील से धमतरी मार्ग में ग्राम सांकरा (बालोद से 25 कि. मी. दूर ) से दक्षिण की ओर 7 कि. मी. कि दूरी पर देव स्थल ग्राम नारागांव स्थित हैं। शक्ति और सौन्दर्य का अनोखा संगम अपने अप्रतिम प्राक्रतिक सौन्दर्य से पर्यटकों का मन मोह लेती हैं। सिया देवी झरना दंडकारण्य पर्वत से प्रारंभ होकर झलमला से होते हुए वन मार्ग में 17 कि.मी. की दुरी तय करती हैं। प्राक्रतिक जल प्रपात एवं गुफ़ाओ से आच्छादित नारागांव स्थित सियादेवी, आध्यात्मिक एवं पर्यटक स्थल के रूप में प्रसिद्ध हैं। वनाच्छादित यह पहाड़ी स्थल प्राक्रतिक जल स्त्रोतो के कारण और भी मनोहारी दिखाई पड़ता हैं। इस पहाड़ी पर दो स्थानों से जल स्त्रोतों का उद्गम हुआ हैं। पूर्व दक्षिण से आने वाला झोलबाहरा और दक्षिण पश्चिम से आने वाला तुमनाला का संगम देखते ही बनता हैं। (adsbygoogle = window.adsbygoogle ||