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#temple 6 महीने में बना था देवबलोदा चरोदा का 6-मासी शिव मंदिर

#temple 6 महीने में बना था देवबलोदा चरोदा का 6-मासी शिव मंदिर

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सघन वन वल्लारियों से आच्छादित मेकल, रामगढ़ तथा सिहावा की पर्वत श्रेणियों से सुरक्षित एवं महानदी, शिवनाथ, खारून, जोंक, हसदो आदि कई छोटी बड़ी नदियों से सिंचित छत्तीसगढ़ प्राचीनकाल में दक्षिण कोसल के नाम से जाना जाता था। इन नदियों के तट और घाटियों में न जाने कितनी सभ्यताओं का उदय, विकास और अस्त कालगति के अनुसार होता रहा, जिनके अवशेष अभी भी अनेक स्थानों पर बिखरे हुए हैं और उनके प्राचीन महत्व और गौरव की महिमा का गुणगान करते नहीं अघाते हैं। ऐसा ही एक प्राचीन स्थल दुर्ग के पास है- देव बलोदा। प्राचीनकाल में देव मंदिरों के लिए प्रसाद शब्द का प्रयोग किया जाता था। प्रसाद का अर्थ होता है वह स्थल जहां मन प्रसन्न हो। जिनकी रमणीयता से देवताओं और मनुष्यों के मन प्रसन्न होते हैं- वे प्रसाद है। इसीलिए प्रसाद या देवमंदिरों के निर्माण के लिए सुरम्य स्थलों का चुनाव किया जाता था। वराहमिहिर लिखते हैं कि वन, नद
#temple चंद्रपुर की चंद्रहासिनी माता का मुख है चंद्र की तरह

#temple चंद्रपुर की चंद्रहासिनी माता का मुख है चंद्र की तरह

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माता सती के अंग जहां-जहां धरती पर गिरे थे, वहां आज वर्तमान में शक्ति माता श्री दुर्गा के शक्तिपीठ स्थापित हैं।छत्तीसगढ़ में भी अनेक स्थानों माता के शक्तिपीठ स्थापित है। जिनमे से एक माता चंद्रहासिनी का मंदिर है। जांजगीर-चाम्पा जिले के डभरा तहसील में मांड नदी,लात नदी और महानदी के संगम पर स्थित है एक गांव चन्द्रपुर, जहाँ शक्ति माँ चंद्रहासिनी देवी का मंदिर है। यहाँ सिद्ध मां दुर्गा के 52 शक्तिपीठों में से एक स्वरूप मां चंद्रहासिनी के रूप में विराजित है। चंद्रमा की आकृति जैसा मुख होने के कारण इसकी प्रसिद्धि चंद्रहासिनी और चंद्रसेनी या चंद्रासैनी मां के नाम से जानी जाती है। चंद्रपुर जिला मुख्यालय जांजगीर-चाम्पा से 120 किलोमीटर तथा रायगढ़ से 32 किलोमीटर और सारंगढ़ से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहां माता चंद्रसेनी का वास है। वहाँ कुछ ही दुर (लगभग 1.5कि.मी.) पर माता नाथलदाई का मंदिर है जो की
#temple ढोलकल के गणेश, जहाँ गिरा था भगवान गणेश का दाँत

#temple ढोलकल के गणेश, जहाँ गिरा था भगवान गणेश का दाँत

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हमारा छत्तीसगढ़ अनेक विविधताओं और रहस्यों से भरा है। जहां धर्म, आस्था और रोमांच का संगम कई स्थानों में एक साथ देखने को मिलता है। ऐसी ही एक जगह है ढोलकल जहां धरती के प्रथम पूज्य देव भगवान गणेश की अद्भुत प्रतिमा स्थित है। प्रदेश की राजधानी रायपुर से लगभग 395 किमी दूर प्राकृतिक छटा के बीच दक्षिण बस्तर के जिला मुख्यालय दंतेवाड़ा से 30 किलोमीटर दूर बैलाडीला की 3000 फीट ऊंची बहुत ही दुर्गम फरसपाल पहाड़ी पर सैकड़ों साल पुरानी, नागवंशीय राजाओं द्वारा स्थापित है भगवान ढोलकल गणेश जी की प्रतिमा। भगवान गणेश जी की यह भव्य प्रतिमा वास्तुकला की दृष्टि से भी अत्यन्त कलात्मक है जो 6 फीट ऊंची ग्रेनाइट पत्थर से निर्मित है। ऊपरी दाएं हाथ में फरसा, ऊपरी बाएं हाथ में टूटा हुआ एक दंत, नीचे दाएं हाथ में अभय मुद्रा में अक्षमाला धारण किए हुए तथा नीचे बाएं हाथ में मोदक धारण किए हुए आयुध के रूप में विराजित है यह अद्भु
#culture तीजा तिहार: कल करू भात खाकर आज सुहागिनों ने रखा तीजा व्रत, जानिए पूजा विधि और महत्व

#culture तीजा तिहार: कल करू भात खाकर आज सुहागिनों ने रखा तीजा व्रत, जानिए पूजा विधि और महत्व

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भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरितालिका तीजा का पर्व इस बार 12 सितंबर को मनाया जा रहा है। मनभावन पति के लिए कुंवारी कन्याएं और अखंड सौभाग्य के लिए सुहागन महिलाएं बड़े उत्साह से यह व्रत रखती हैं। छत्तीसगढ़ में तीजा का पर्व काफी माना जाता है। तीजा के लिए मायके से भाई या पिता अपनी बेटी के ससुराल जाकर तीजा मनाने का न्योता देकर उसे मायके ले आता है। सुहागन महिलाएं तीजा का व्रत अपने मायके में रहकर करती हैं। बेटी को मायके आने का न्यौता देने के अलावा तीजा के लुगरा, कडु भात खाना, हाथों में मेहंदी लगाना, तीजा के दिन निर्जल व्रत रखना, शाम को फुलेरा सजाना, प्रदोष काल में पूजा करना, रात्रि जागराण करना और ठीक अगले दिन चतर्थी को सुबह विसर्जन करने के बाद तिखूर खाकर व्रत तोड़ने की परंपरा बहुत ही अनोखी है। अन्य राज्यों की अपेक्षा छत्तीसगढ़ में तीजा का महत्व कुछ अधिक है। न्यौता मायके से, लिवाने सस
#culture तीजा के तीज सुहागन महिलाओं का त्यौहार, जानिए पौराणिक कथा और महत्व

#culture तीजा के तीज सुहागन महिलाओं का त्यौहार, जानिए पौराणिक कथा और महत्व

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सुहागिनें जहां अपने पति की लंबी आयु के लिए तीज का व्रत रखती हैं, वहीं अविवाहित लड़कियां अच्छा वर प्राप्त करने के लिए यह व्रत करती हैं। यूं तो हरतालिका तीज देश के कई राज्यों में मनाई जाती है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इस त्योहार का उत्साह दोगुना हो जाता है। मानसून के मौसम का स्वागत करने के लिए छत्तीसगढ़ और उत्तरी भारत में तीज त्योहार ('छत्तीसगढ़ी  में तीजा') मनाया जाता है। पति की लंबी उम्र की कामना और परिवार की खुशहाली के लिए सभी विवाहित महिलाओं में निर्जला उपवास रखती है (वे पूरे दिन पानी नहीं पीते हैं) और शाम को तीज माता पार्वती और भगवान शिव की पूजा के बाद, वे पानी और भोजन लेती है। तीज के एक दिन पहले सभी महिलाये एक दूसरे के घर जाकर कड़वा भोजन (छत्तीसगढ़ी में 'करू भात') का सेवन करती है। करेले की सब्जी एवं अन्य व्यंजन बनाये जाते है।  यह पर्व भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया (भादो की शुक्ल पक्ष क
#culture बैलो के श्रृँगार व गर्भ पूजन का पर्व है पोला, जानिए पूजन विधि, महत्व और पौराणिक कथा

#culture बैलो के श्रृँगार व गर्भ पूजन का पर्व है पोला, जानिए पूजन विधि, महत्व और पौराणिक कथा

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किसी भी राज्य की सार्थक पहचान उनकी संस्कृति से होती है। जिसमें छत्तीसगढ़ राज्य भारत देश का एक मात्र ऐसा राज्य है जो पूर्णतः कृषि कार्य प्रधान राज्य है। यहाँ के निवासी पूरे वर्ष भर खेती कार्य मे लगे रहते है। धान की खेती यहाँ की प्रमुख फसल है। यहाँ के निवासियों ने अपनी सांस्कृतिक विरासत को कुछ इस तरह संजोकर रखा है, कि कृषि कार्यो के दौरान साल के विभिन्न अवसरो पर- खेती कार्य आरंभ होने के पहले अक्ती, फसल बोने के समय सवनाही, उगने के समय एतवारी-भोजली, फसल लहलहाने के समय हरियाली, आदि आदि अवसरो व ऋतु परिवर्तन के समय को धार्मिक आस्था प्रकट कर पर्व-उत्सव व त्योहार के रूप मे मनाते हुए जनमानस मे एकता का संदेश देते है। यहाँ के निवासी, पेड़-पौधों, जीव-जंतुओं तथा प्रकृति को भी भगवान की ही तरह पूजा करते है। बैलो के श्रृँगार व गर्भ पूजन का पर्व-पोला पोला पर्व के अवसर पर तरह तरह के व्यंजन बनाए जाते है
#culture आज माताएं रखेंगी कमरछठ उपवास, जानिए पूजा विधि

#culture आज माताएं रखेंगी कमरछठ उपवास, जानिए पूजा विधि

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रायपुर | छत्तीसगढ़ का लोकपर्व हलषष्ठी (कमरछठ) यह पर्व माताओं का संतान के लिए किया जाने वाला, छत्तीसगढ़ राज्य की अनूठी संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जिसे हर वर्ग, हर जाति मे बहूत ही सद्भाव से मनाया जाता है। हलषष्ठी को हलछठ, कमरछठ या खमरछठ भी कहा जाता है। यह पर्व भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। संतान प्राप्ति व उनके दीर्घायू सुखमय जीवन की कामना रखकर माताएँ इस व्रत को रखती है। इस दिन माताएँ सूबह से ही महुआ पेड़ की डाली का दातून कर, स्नान कर व्रत धारण करती है।भैस के दुध की चाय पीती है।तथा दोपहर के बाद घर के आँगन मे, मंदिर-देवालय या गाँव के चौपाल आदि मे बनावटी तालाब (सगरी) बनाकर , उसमें जल भरते है।सगरी का जल, जीवन का प्रतीक है। तालाब के पार मे बेर, पलाश,गूलर आदि पेड़ों की टहनियो तथा काशी के फूल को लगाकर सजाते है।सामने एक चौकी या पाटे पर गौरी-गणेश, कलश रखकर हलषष्ठी देवी
#foodrecipe जानिए छत्तीसगढ़ का फेवरेट नाश्ता “फरा” बनाने की विधि

#foodrecipe जानिए छत्तीसगढ़ का फेवरेट नाश्ता “फरा” बनाने की विधि

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हमारा छत्तीसगढ़ धन का कटोरा है। यहाँ चावल की कई प्रजाति उगाई जाती है। उसी तरह यहाँ चावल को कई तरह की डिश बनाकर खायी जाती है। हम आपको फरा बनाने की विधि बता रहे है।  इसे पके हुए चावल (भात) और चावल के आटे से बनाया जाता है। फरा बनाने के लिए सामग्री 1. उबला चावल (भात) - 1 कटोरी 2. चावल का आटा - 2 कटोरी 3. खड़ा तिल - 2 चम्मच 4. खड़ा लाल मिर्च - 1-2 कलियाँ 5. मीठी पत्ती - थोडा सा 6. नमक - स्वादानुसार 7. तेल - तलने के लिए (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); बनाने की विधि 1. सबसे पहले भात और चावल आटे को पानी मिलाकर गूंध ले। 2.अब इस गूंधे हुए आटे की छोटी छोटी लोई लेकर उसे पतली बत्ती की तरह बना ले। 3. अब एक कढ़ाई में तेल गरम करे। 4. उसमे तिल, मीठी पत्ती और मिर्ची डालकर तड़का लगाए। 5. अब उसमे पानी (आवश्यकतानुसार उतना पानी डाले जितने में फरा डूब जाये) डाल दे। बनाये हुए फरे को उ
#temple बागबाहरा में माता के इस दरबार में भालू भी आते है प्रसाद लेने

#temple बागबाहरा में माता के इस दरबार में भालू भी आते है प्रसाद लेने

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यहाँ पर माता की जैसे आरती की घंटी बजती है माता के दरबार में भालू प्रसाद के लिए आते है, इन भालुओ ने आज तक किसी को कोई नुकसान नही पहुचाया है इसे माता का चमत्कार भी कहा जाता है। बागबाहरा | चंडी माता मन्दिर महासमुंद जिला अंतर्गत ग्राम बागबाहरा के समीप घुंचापाली में स्थित है। ग्राम बागबाहरा चारो ओर प्राकृतिक सौंदर्य से परिपूर्ण है। चारो ओर से जंगलो और पहाड़िओ से घिरे ग्राम में विराजमान है स्वयंभू माँ चंडी। माता चंडी रूप देखते ही बनता है लगभग 9 फ़ीट ऊंची माँ की विशालकाय भूगर्भित प्रतिमा जो निरंतर बढ़ रही है, स्वयं में अद्वितीय है। मंदिर पहाड़ी के ऊपर स्थित है माँ चंडी का मंदिर जिला महासमुंद से 38 km की दुरी पर स्थित है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); पहाड़ी पर चढ़ने हेतु सीढ़ियों की कोई आवश्यकता नहीं है लंबे ढलान के होने से चढ़ाई अत्यंत सुगम हो जाती है अतः बुजुर्गों और अस्वस्
#culture पाट जात्रा रस्म के साथ ही शुरू हुआ बस्तर दशहरे की तैयारियां

#culture पाट जात्रा रस्म के साथ ही शुरू हुआ बस्तर दशहरे की तैयारियां

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बस्तर | बस्तर दशहरे की शुरुआत श्रावण (सावन) के महीने में पड़ने वाली हरियाली अमावस्या यानि के हरेली से होती है। इस दिन रथ बनाने के लिए जंगल से पहली लकड़ी लाई जाती है।  इस रस्म को पाट जात्रा कहा जाता है। यह त्योहार दशहरा के बाद 75 दिनों तक चलता है और अश्वनी के महीने में शुक्ल पक्ष के 13 वे दिन मुरिया दरबार की रस्म के साथ समाप्त होती है। इस रस्म में बस्तर के महाराज दरबार लगाकार जनता की समस्याएं सुनते हैं। यह त्योहार देश का सबसे ज्यादा दिनों तक मनाया जाने वाला त्योहार है। दशहरे में बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की की विशेष पूजा की जाती है। उनके लिए यहां एक भव्य रथ तैयार किया जाता है, इस रथ में उनका छत्र रखकर नवरात्रि के दौरान भ्रमण के लिए निकाला जाता है। मान्यता है कि भगवान राम ने अपने वनवास के लगभग दस साल दंडकारण्य में बिताए थे। छत्तीसगढ़ का बस्तर इलाका प्राचीन समय में दंडकारण्य के रू