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Raipur Train Time Table Arrivals and Departures

Raipur Train Time Table Arrivals and Departures

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Arrival / Departure at Station - RAIPUR JN (R) Train Number Train Name Source Station Dest. Station Train Timings at R Running Days Available Classes Arrival Depart. Halt Su Mo Tu We Th Fr Sa 1A FC 2A 3A 3E CC SL 2S 58217 TIG RAIPUR PASS TIG R 00:30 -- -- Y Y Y Y Y Y Y UNRESERVED TRAIN 58218 R TIG PASS R TIG -- 02:00 -- Y Y Y Y Y Y Y UNRESERVED TRAIN 68701 R DURG MEMU R DURG -- 04:50 -- Y Y Y Y Y Y Y UNRESERVED TRAIN 58527 R VSKP PASS R VSKP -- 05:30 -- Y Y Y Y Y Y Y UNRESERVED TRAIN 68730 DGG R MEMU DGG R 06:30 -- -- Y Y Y Y Y Y Y UNRESERVED TRAIN 68728 R BSP MEMU R BSP -- 07:05 -- Y Y Y Y Y Y Y UNRESERVED TRA...
Raipur Airport Flight Schedule Arrivals Departures Status

Raipur Airport Flight Schedule Arrivals Departures Status

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Raipur is the capital city of Chhattisgarh and has flight connectivity with various cities of India through Swami Vivekananda Airport.  Daily flights from Raipur to Delhi, Mumbai, Kolkata, Hyderabad operated by various airlines Indigo, Air India, Vistara etc. You can use our list to track specific flight and airlines status at Swami Vivekanda Airport Raipur Chhattisgarh. Raipur Swami Vivekananda Airport Arrivals powered by Airportia
हरेली तिहार: छत्तीसगढ़ का पहला तिहार, अच्छे फसल और स्वास्थ्य की कामना

हरेली तिहार: छत्तीसगढ़ का पहला तिहार, अच्छे फसल और स्वास्थ्य की कामना

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धान का कटोरा कहे जाने वाले छत्तीसगढ़ अपनी संस्कृति और तीज त्योहारों के लिए भी प्रसिद्ध है. हरेली तिहार पहला त्यौहार है जिसका किसानों के लिए बहुत महत्व है. हरेली छत्तीसगढ़ी शब्द है जिसका हिंदी में अर्थ होता है ‘हरियाली’. तब प्रकृति भी प्रचंड गर्मी के बाद हरियाली से आच्छादित हो जाती है. छत्तीसगढ़ के ‘गोंड‘ जनजातीय का मुख्य रूप से महत्वपूर्ण त्योहार है. यह त्यौहार हिंदू कैलेंडर के सावन (श्रावण) महीने के श्रावणी अमावस्या के दिन मनाया जाता है. जो जुलाई और अगस्त के बीच वर्षा ऋतु में होता है. यह त्यौहार ‘श्रावण’ के महीने के प्रारंभ को दर्शाता है जो कि हिंदुओं का पवित्र महीना है. रिवाज: पशुधन और किसानी में काम आने वाले औजारों की पूजा की जाती है  यह त्योहार पूरे दिन मनाया जाता है और किसी को भी कोई काम करने की अनुमति नहीं है। खेतों से संबंधित उपकरण और गायों की इस शुभ दिन पर किसान पूजा करत
#Temple बम्लेश्वरी माता मंदिर डोंगरगढ़, राजनांदगाव

#Temple बम्लेश्वरी माता मंदिर डोंगरगढ़, राजनांदगाव

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छत्तीसगढ़ राज्य के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में स्थित है मां बम्लेश्वरी का भव्य मंदिर। पहाड़ों से घिरे होने के कारण इसे पहले डोंगरी और अब डोंगरगढ़ के नाम से जाना जाता है। यहां ऊंची चोटी पर विराजित बगलामुखी मां बम्लेश्वरी देवी का मंदिर। छत्तीसगढ़ ही नहीं देश भर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केन्द्र बना हुआ है। हजार से ज्यादा सीढिय़ां चढ़कर हर दिन मां के दर्शन के लिए वैसे तो देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां आते हैं लेकिन नवरात्रि के दौरान अलग ही दृश्य होता है। जो ऊपर नहीं चढ़ पाते उनके लिए मां का एक मंदिर पहाड़ी के नीचे भी है जिसे छोटी बम्लेश्वरी मां के रूप में पूजा जाता है। अब मां के मंदिर में जाने के लिए रोप वे भी लगाया गया है। मंदिर का इतिहास  लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व इसे कामाख्या नगरी के नाम से जाना जाता था। यहाँ राजा वीरसेन का शासन था। वे नि:संतान थे। संतान की कामना के लिए उन्
#Temple लक्ष्मण मंदिर सिरपुर, महासमुंद

#Temple लक्ष्मण मंदिर सिरपुर, महासमुंद

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सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर भारत में पहली ईंट से निर्मित मंदिर है। सिरपुर को श्रीपुर के नाम से भी जाना जाता है इसका अर्थ है "शुभता का शहर", "बहुतायत", "लक्ष्मी"। यह छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में एक गांव है और यह महानदी नदी के तट पर राजधानी रायपुर से 78 किमी दूर और महासामंद शहर से 35 किमी दूर है। सन 1872 में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा ( जो कि एक औपनिवेशिक ब्रिटिश भारत में अधिकारी थे) सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर पर उनकी रिपोर्ट द्वारा अंतर्राष्ट्रीय ध्यान में लाई गई। भारत में यह एकमात्र लक्षमण मंदिर है। 6 वीं शताब्दी के दौरान  सरभपुरियस और पाण्डुवंसिस के शासन काल में सिरपुर दक्षिण कोशल राज्य का केंद्र था। सिरपुर में और आसपास के पुरातात्विक अवशेष मंदिरों और मठों के रूप में हिन्दू और बौद्ध स्मारकों दोनों के हैं। उनमें से, सबसे अच्छी तरह से संरक्षित शानदार मंदिर, वसाता द्वारा निर्मित पूर्व मुखी ल
#Temple दंतेवाड़ा की माँ दंतेश्वरी, जगदलपुर

#Temple दंतेवाड़ा की माँ दंतेश्वरी, जगदलपुर

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दन्तेश्वरी मंदिर जगदलपुर शहर से लगभग 84 किमी (52 मील) स्थित है। माता दंतेश्वरी का यह मंदिर बहुत ही प्रसिद्ध एवं पवित्र मंदिर है, यह माँ शक्ति का अवतार है। माना जाता है कि इस मंदिर में कई दिव्य शक्तियां हैं। दशहरा के दौरान हर साल देवी की आराधना करने के लिए आसपास के गांवों और जंगलों से हजारों आदिवासी आते हैं। यह मंदिर जगदलपुर के दक्षिण-पश्चिम में दंतेवाड़ा में स्थित है और यह पवित्र नदियां शंकिणी और डंकिनी के संगम पर स्थित है, यह छह सौ वर्ष पुराना मंदिर भारत की प्राचीन विरासत स्थलों में से एक है और यह मंदिर बस्तर क्षेत्र का सांस्कृतिक-धार्मिक-सामाजिक का प्रतिनिधित्व है। आज का विशाल मंदिर परिसर इतिहास और परंपरा की सदियों से वास्तव में खड़ा स्मारक है। इसके समृद्ध वास्तुशिल्प और मूर्तिकला और इसके जीवंत उत्सव परंपराओं का प्रमाण है। दंतेश्वरी माई मंदिर इस क्षेत्र के लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण
#temple गंगरेल बांध के समीप स्थित है अंगारमोती माता का धाम

#temple गंगरेल बांध के समीप स्थित है अंगारमोती माता का धाम

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गंगरेल बांध जिसे आर. एल. बांध ( रविशंकर सागर बांध ) भी कहते है । सागर बांध भारत के छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित है । यह महानदी नदी के पार बनाया गया है छत्तीसगढ़ में यह सबसे लम्बा बांध है ।यह बांध वर्षभर के सिचाई प्रदान करता है जिससे किसान प्रतिवर्ष दो फसलों का उत्पादन कर सकते है और भिलाई स्टील प्लांट और नई राजधानी रायपुर को भी पानी प्रदान करता है । प्लांट में 10 मेगावाट की हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर क्षमता है। यह रायपुर राजधानी से 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है । सन् 1978 में जब गंगरेल बांध बनकर तैयार हुआ उस समय अनेक गाँव के साथ अनेक देवी-देवतओं के मंदिर भी जल में समां गए थे, जिनमें से एक माँ अंगारमोती का मंदिर भी था। इसके पश्चात विधि-विधान के साथ देवी की मूर्ति को पूर्व स्थान से हटाकर गंगरेल बांध के समीप स्थापित किया गया है। यहाँ विशाल वृक्ष के नीचे खुले चबूतरे पर उनकी प्राण-प्रतिष्
#temple कौशल्या माता मंदिर चंदखुरी, सात तालाबों से घिरा है श्री राम की माता कौशल्या का यह मंदिर

#temple कौशल्या माता मंदिर चंदखुरी, सात तालाबों से घिरा है श्री राम की माता कौशल्या का यह मंदिर

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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चंदखुरी ग्राम में माता कौशल्या का प्राचीन मंदिर विराजमान है। यह मंदिर दुर्लभतम है, जैसे पुष्कर में ब्रह्मा जी का एकमात्र प्राचीन मंदिर है, वैसे ही रायपुर के पास कौशल्या जी का एकमात्र मंदिर स्थित है। प्राकृतिक सुषमा के अनेक अनुपम दृश्य इस स्थल पर दृष्टिगोचर होते हैं। इस मंदिर के गर्भगृह में मां कौशल्या की गोद में बालरुप में भगवान श्रीरामजी की वात्सल्यम प्रतिमा श्रद्धालुओं एवं भक्तों का मन मोह लेती है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); दक्षिण कौशल यानी छत्तीसगढ़ राज्य मां कौशल्या के नाम से जाना जाता है। इसे भगवान राम का ननिहाल कहा जाता है। सोमवंशी नरेश ने माता कौशल्या और भगवान राम को 7 तालाबों के बीच स्थापित कर आस्था का दीप जलाया था। इस भक्ति भाव की किरणें आज पूरे देश में फैल रही हैं। छत्तीसगढ़ की पावन भू
#Temple कुकुरदेव मंदिर, इस प्राचीन मंदिर में होती है कुत्ते की पूजा

#Temple कुकुरदेव मंदिर, इस प्राचीन मंदिर में होती है कुत्ते की पूजा

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छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से छह किलोमीटर दूर मालीघोरी खपरी गांव में “कुकुरदेव” नाम का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर किसी देवी-देवता को नहीं बल्कि कुत्ते को समर्पित है, हालांकि साथ में शिवलिंग आदि प्रतिमाएं स्तिथ है। मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से कुकुर खांसी व कुत्ते के काटने का कोई भय नहीं रहता है। मंदिर का इतिहास इस मंदिर का निर्माण फणी नागवंशी शासकों द्वारा 14वीं-15 वीं शताब्दी में कराया गया था। मंदिर के गर्भगृह में कुत्ते की प्रतिमा स्थापित है और उसके बगल में एक शिवलिंग भी है। कुकुर देव मंदिर 200 मीटर के दायरे में फैला है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर भी दोनों ओर कुत्तों की प्रतिमा लगाई गई है। लोग शिव जी के साथ-साथ कुत्ते (कुकुरदेव) की वैसे ही पूजा करते हैं जैसे शिवमंदिरों में नंदी की पूजा होती है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); यह मंदिर दरअसल भैरव स्मारक
#culture 600 वर्ष पुराना बस्तर दशहरा विश्व का सबसे लम्बा चलने वाला पर्व है, 75 दिनों तक मनाया जाता है

#culture 600 वर्ष पुराना बस्तर दशहरा विश्व का सबसे लम्बा चलने वाला पर्व है, 75 दिनों तक मनाया जाता है

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बस्तर का दशहरा अपनी अभूतपूर्व परंपरा व संस्कृति की वजह से विश्व प्रसिद्ध है। यह कोई आम पर्व नहीं है यह विश्व का सबसे लंबी अवधि तक चलने वाला पर्व है। छत्तीसगढ़ के बस्तर में मनाया जाने वाला दशहरा 75 दिन तक मनाया जाता है। बस्तरवासी वगभग 600 साल से यह पर्व मनाते आ रहे हैं। बस्तर ही एकमात्र जगह है जहां दशहरे पर रावण का पुतला दहन नहीं किया जाता। यह पर्व बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी की आराधना से जुड़ा हुआ है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); बस्तर के आदिवासियों की अभूतपूर्व भागीदारी का ही प्रतिफल है कि बस्तर दशहरा की राष्ट्रीय पहचान स्थापित हुई। प्रतिवर्ष दशहरा पर्व के लिए परगनिया माझी अपने अपने परगनों से सामग्री जुटाने का प्रयत्न करते थे। सामग्री जुटाने का काम दो तीन महीने पहले से होने लगता था। इसके लिए प्रत्येक तहसील का तहसीलदार सर्वप्रथम बिसाहा पैसा बाँट देता था,