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नवरात्रि विशेष: गंगरेल बांध के समीप स्थित है अंगारमोती माता का धाम

नवरात्रि विशेष: गंगरेल बांध के समीप स्थित है अंगारमोती माता का धाम

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गंगरेल बांध जिसे आर. एल. बांध ( रविशंकर सागर बांध ) भी कहते है। सागर बांध भारत के छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में स्थित है। यह महानदी नदी के पार बनाया गया है छत्तीसगढ़ में यह सबसे लम्बा बांध है। यह बांध वर्षभर के सिचाई प्रदान करता है जिससे किसान प्रतिवर्ष दो फसलों का उत्पादन कर सकते है और भिलाई स्टील प्लांट और नई राजधानी रायपुर को भी पानी प्रदान करता है। प्लांट में 10 मेगावाट की हाइड्रो इलेक्ट्रिक पावर क्षमता है। यह रायपुर राजधानी से 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। सन् 1978 में जब गंगरेल बांध बनकर तैयार हुआ उस समय अनेक गाँव के साथ अनेक देवी-देवतओं के मंदिर भी जल में समां गए थे, जिनमें से एक माँ अंगारमोती का मंदिर भी था। इसके पश्चात विधि-विधान के साथ देवी की मूर्ति को पूर्व स्थान से हटाकर गंगरेल बांध के समीप स्थापित किया गया है। यहाँ विशाल वृक्ष के नीचे खुले चबूतरे पर उनकी प्राण-प्रति
नवरात्रि विशेष: देखे राजनांदगांव के बर्फानी धाम और पाताल भैरवी का विशाल मंदिर

नवरात्रि विशेष: देखे राजनांदगांव के बर्फानी धाम और पाताल भैरवी का विशाल मंदिर

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बर्फानी धाम छत्तीसगढ़ में राजनांदगांव शहर में एक विशाल हिन्दू मंदिर है। यह दुर्ग से 40 किलोमीटर (25 मिनट) दूर है। एक बड़ा शिव लिंग मंदिर के शीर्ष पर देखा जा सकता है, जबकि एक बड़ी नंदी की प्रतिमा सामने खड़ी है। मंदिर का निर्माण तीन स्तरों में किया गया है। सबसे नीचे माँ पाताल भैरवी का मंदिर है। दूसरा मंजिल में नवदुर्गा या त्रिपुरा सुंदरी माता का मंदिर है और सबसे ऊपर शिव जी का मंदिर है। वीडियो देखे https://youtu.be/jYFF0srjrvo बर्फानी धाम राजनांदगाव कैसे पहुंचे सड़क मार्ग से: पाताल भैरवी देवी मंदिर राजनंदगांव में आशा नगर के पास स्थित है। यह राजनांदगांव बस स्टेशन से सिर्फ 5 किमी दूर स्थित है। यह लोकप्रिय रूप से बरफ़ानी धाम या पाताल भैरवी मंदिर के नाम से जाना जाता है। ट्रेन से: सीधे लोकल या पैसेंजर ट्रेने रायपुर से उपलब्ध हैं। राजनांदगांव रायपुर से 89 किमी (1:30 घंटे) दू
नवरात्रि विशेष: बस्तर की तरह मौली माता मंदिर, फिंगेश्वर में भी होता है शाही दशहरा

नवरात्रि विशेष: बस्तर की तरह मौली माता मंदिर, फिंगेश्वर में भी होता है शाही दशहरा

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बस्तर दशहरे की तरह फिंगेश्वर का शाही दशहरे की अपनी अलग पहचान है। यह दशहरा भी मौली माता की पूजा अर्चना के बाद यहाँ के शाही राजा इस त्यौहार की शुरुआत करते है। जिसे देखने के लिए दूर दूर से लोग आते है। मौली माता का ऐतिहासिक मंदिर गरियाबंद जिले के फिंगेश्वर विकासखंड में स्थित है। राजधानी रायपुर से फिंगेश्वर लगभग 60 KM दूर है। पौराणिक मान्यता पौराणिक मान्यता व पुजारी सोभा राम भंडारी के अनुसार फिंगेश्वर के राजा ठाकुर दलगंजन सिंह यात्रा में जा रहे थे तभी अचानक हमलावरों ने आक्रमण कर दिया वाही मौली माता एक बुढ़िया के रूप में आयी वहां राजा ठाकुर दलगंजन सिंह हमलावरों से घिर गए थे तब उन्हें अचानक माता जी का साक्षात्कार हुआ। माता जी की कुछ इशारा पाते ही वह उठ खड़े हुए और युद्ध में विजयी हुए। तब राजा ने माता के पास जाकर प्रणाम कर वापिस महल की ओर आने लगे माता भी वृद्धा का रूप लेकर राजा के पीछे पीछे
नवरात्रि विशेष: कौशल्या माता मंदिर चंदखुरी, सात तालाबों से घिरा है भगवान श्री राम का नौनिहाल

नवरात्रि विशेष: कौशल्या माता मंदिर चंदखुरी, सात तालाबों से घिरा है भगवान श्री राम का नौनिहाल

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छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से करीब 27 किलोमीटर की दूरी पर स्थित चंदखुरी ग्राम में माता कौशल्या का प्राचीन मंदिर विराजमान है। यह मंदिर दुर्लभतम है, जैसे पुष्कर में ब्रह्मा जी का एकमात्र प्राचीन मंदिर है, वैसे ही रायपुर के पास कौशल्या जी का एकमात्र मंदिर स्थित है। प्राकृतिक सुषमा के अनेक अनुपम दृश्य इस स्थल पर दृष्टिगोचर होते हैं। इस मंदिर के गर्भगृह में मां कौशल्या की गोद में बालरुप में भगवान श्रीरामजी की वात्सल्यम प्रतिमा श्रद्धालुओं एवं भक्तों का मन मोह लेती है। दक्षिण कौशल यानी छत्तीसगढ़ राज्य मां कौशल्या के नाम से जाना जाता है। इसे भगवान राम का ननिहाल कहा जाता है। सोमवंशी नरेश ने माता कौशल्या और भगवान राम को 7 तालाबों के बीच स्थापित कर आस्था का दीप जलाया था। इस भक्ति भाव की किरणें आज पूरे देश में फैल रही हैं। छत्तीसगढ़ की पावन भूमि में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की जननी माता कौ
नवरात्रि विशेष: जानिए चंद्रपुर की चंद्रहासिनी माता के बारे में

नवरात्रि विशेष: जानिए चंद्रपुर की चंद्रहासिनी माता के बारे में

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माता सती के अंग जहां-जहां धरती पर गिरे थे, वहां आज वर्तमान में शक्ति माता श्री दुर्गा के शक्तिपीठ स्थापित हैं।छत्तीसगढ़ में भी अनेक स्थानों माता के शक्तिपीठ स्थापित है। जिनमे से एक माता चंद्रहासिनी का मंदिर है। जांजगीर-चाम्पा जिले के डभरा तहसील में मांड नदी,लात नदी और महानदी के संगम पर स्थित है एक गांव चन्द्रपुर, जहाँ शक्ति माँ चंद्रहासिनी देवी का मंदिर है। यहाँ सिद्ध मां दुर्गा के 52 शक्तिपीठों में से एक स्वरूप मां चंद्रहासिनी के रूप में विराजित है। चंद्रमा की आकृति जैसा मुख होने के कारण इसकी प्रसिद्धि चंद्रहासिनी और चंद्रसेनी या चंद्रासैनी मां के नाम से जानी जाती है। चंद्रपुर जिला मुख्यालय जांजगीर-चाम्पा से 120 किलोमीटर तथा रायगढ़ से 32 किलोमीटर और सारंगढ़ से 22 कि.मी. की दूरी पर स्थित है। यहां माता चंद्रसेनी का वास है। वहाँ कुछ ही दुर (लगभग 1.5कि.मी.) पर माता नाथलदाई का मंदिर है जो की
नवरात्रि विशेष: जानिए बस्तर की कुलदेवी माँ दंतेश्वरी के बारे में

नवरात्रि विशेष: जानिए बस्तर की कुलदेवी माँ दंतेश्वरी के बारे में

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दन्तेश्वरी मंदिर जगदलपुर शहर से लगभग 84 किमी (52 मील) स्थित है। माता दंतेश्वरी का यह मंदिर बहुत ही प्रसिद्ध एवं पवित्र मंदिर है, यह माँ शक्ति का अवतार है। माना जाता है कि इस मंदिर में कई दिव्य शक्तियां हैं। दशहरा के दौरान हर साल देवी की आराधना करने के लिए आसपास के गांवों और जंगलों से हजारों आदिवासी आते हैं। यह मंदिर जगदलपुर के दक्षिण-पश्चिम में दंतेवाड़ा में स्थित है और यह पवित्र नदियां शंकिणी और डंकिनी के संगम पर स्थित है, यह छह सौ वर्ष पुराना मंदिर भारत की प्राचीन विरासत स्थलों में से एक है और यह मंदिर बस्तर क्षेत्र का सांस्कृतिक-धार्मिक-सामाजिक का प्रतिनिधित्व है। आज का विशाल मंदिर परिसर इतिहास और परंपरा की सदियों से वास्तव में खड़ा स्मारक है। इसके समृद्ध वास्तुशिल्प और मूर्तिकला और इसके जीवंत उत्सव परंपराओं का प्रमाण है। दंतेश्वरी माई मंदिर इस क्षेत्र के लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण
नवरात्रि विशेष : मां बम्लेश्वरी मंदिर डोंगरगढ़, राजनांदगाव के बारे में जानिए

नवरात्रि विशेष : मां बम्लेश्वरी मंदिर डोंगरगढ़, राजनांदगाव के बारे में जानिए

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छत्तीसगढ़ राज्य के राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ में स्थित है मां बम्लेश्वरी का भव्य मंदिर। पहाड़ों से घिरे होने के कारण इसे पहले डोंगरी और अब डोंगरगढ़ के नाम से जाना जाता है। यहां ऊंची चोटी पर विराजित बगलामुखी मां बम्लेश्वरी देवी का मंदिर। छत्तीसगढ़ ही नहीं देश भर के श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केन्द्र बना हुआ है। हजार से ज्यादा सीढिय़ां चढ़कर हर दिन मां के दर्शन के लिए वैसे तो देश के कोने-कोने से श्रद्धालु यहां आते हैं लेकिन नवरात्रि के दौरान अलग ही दृश्य होता है। जो ऊपर नहीं चढ़ पाते उनके लिए मां का एक मंदिर पहाड़ी के नीचे भी है जिसे छोटी बम्लेश्वरी मां के रूप में पूजा जाता है। अब मां के मंदिर में जाने के लिए रोप वे भी लगाया गया है। मंदिर का इतिहास  लगभग ढाई हजार वर्ष पूर्व इसे कामाख्या नगरी के नाम से जाना जाता था। यहाँ राजा वीरसेन का शासन था। वे नि:संतान थे। संतान की कामना के ल
225 साल बाद भी चार मंजिला इस बावली के दो मंजिल पानी में डूबे हुए हैं, राजस्थान की तर्ज पर किया निर्माण

225 साल बाद भी चार मंजिला इस बावली के दो मंजिल पानी में डूबे हुए हैं, राजस्थान की तर्ज पर किया निर्माण

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कवर्धा (एजेंसी)| रियासत काल में यहां राजस्थान की तर्ज पर बावली बना है। 225 साल बाद भी चार मंजिला इस बावली का दो मंजिला पानी में डूबा हुआ है। इसके बावजूद पानी का प्रभाव इनके कमरों पर नहीं पड़ता। बहुकोणीय आकृति में बने इस बावली में 8 कमरे हैं, जहां रियासती दौर में राजा- रानी विश्राम किया करते थे। स्थानीय लोगों ने इस बावली को कभी सूखते हुए नहीं देखा निर्माण के समय जलस्रोतों का अध्ययन करने के बाद यहां खोदाई कर बावली बनवाया गया था। इसमें आज भी पानी मौजूद है। पुराने समय में बावली के पानी का उपयोग सिंचाई, पेयजल और फव्वारों में किया जाता था। आज भी इसके पानी का उपयोग सिंचाई में होता है। राजमहल के पास मौजूद बावली खंडहर में तब्दील राजमहल के पास एक अन्य बावली मौजूद है, जिसे रानी बावली के नाम से जानते हैं। देखरेख के अभाव में यह बावली उजाड़ हो चुका है। राजघराने के खड्गराज सिंह इस बावली को संरक्षित
#Temple लक्ष्मण मंदिर सिरपुर, महासमुंद

#Temple लक्ष्मण मंदिर सिरपुर, महासमुंद

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सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर भारत में पहली ईंट से निर्मित मंदिर है। सिरपुर को श्रीपुर के नाम से भी जाना जाता है इसका अर्थ है "शुभता का शहर", "बहुतायत", "लक्ष्मी"। यह छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में एक गांव है और यह महानदी नदी के तट पर राजधानी रायपुर से 78 किमी दूर और महासामंद शहर से 35 किमी दूर है। सन 1872 में अलेक्जेंडर कनिंघम द्वारा ( जो कि एक औपनिवेशिक ब्रिटिश भारत में अधिकारी थे) सिरपुर में लक्ष्मण मंदिर पर उनकी रिपोर्ट द्वारा अंतर्राष्ट्रीय ध्यान में लाई गई। भारत में यह एकमात्र लक्षमण मंदिर है। 6 वीं शताब्दी के दौरान  सरभपुरियस और पाण्डुवंसिस के शासन काल में सिरपुर दक्षिण कोशल राज्य का केंद्र था। सिरपुर में और आसपास के पुरातात्विक अवशेष मंदिरों और मठों के रूप में हिन्दू और बौद्ध स्मारकों दोनों के हैं। उनमें से, सबसे अच्छी तरह से संरक्षित शानदार मंदिर, वसाता द्वारा निर्मित पूर्व मुखी ल
#Temple कुकुरदेव मंदिर, इस प्राचीन मंदिर में होती है कुत्ते की पूजा

#Temple कुकुरदेव मंदिर, इस प्राचीन मंदिर में होती है कुत्ते की पूजा

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छत्तीसगढ़ के बालोद जिले से छह किलोमीटर दूर मालीघोरी खपरी गांव में “कुकुरदेव” नाम का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। यह मंदिर किसी देवी-देवता को नहीं बल्कि कुत्ते को समर्पित है, हालांकि साथ में शिवलिंग आदि प्रतिमाएं स्तिथ है। मान्यता है कि यहाँ दर्शन करने से कुकुर खांसी व कुत्ते के काटने का कोई भय नहीं रहता है। मंदिर का इतिहास इस मंदिर का निर्माण फणी नागवंशी शासकों द्वारा 14वीं-15 वीं शताब्दी में कराया गया था। मंदिर के गर्भगृह में कुत्ते की प्रतिमा स्थापित है और उसके बगल में एक शिवलिंग भी है। कुकुर देव मंदिर 200 मीटर के दायरे में फैला है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर भी दोनों ओर कुत्तों की प्रतिमा लगाई गई है। लोग शिव जी के साथ-साथ कुत्ते (कुकुरदेव) की वैसे ही पूजा करते हैं जैसे शिवमंदिरों में नंदी की पूजा होती है। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); यह मंदिर दरअसल भैरव स्मारक