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13 वर्ष की उम्र में अकलतरा में हुई थी मुनि श्री तरुण सागर की दीक्षा, 2 साल निवास भी किये

13 वर्ष की उम्र में अकलतरा में हुई थी मुनि श्री तरुण सागर की दीक्षा, 2 साल निवास भी किये

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अकलतरा(जांजगीर-चांपा) | बचपन में तरुण सागर महाराज ने आचार्य पुष्पदन्त सागर महाराज से वैराग्य की अनुमति मांगी। लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया, पवन कुमार ने 3 दिन न खाया न पीया। जिद देख परिजन छिन्दवाड़ा (म.प्र.) ले गए। वहां, आचार्य पुष्पदन्त सागर से फिर मिलवाया। आचार्य हठ देख आखिरकार मान ही गए। और वे छिन्दवाड़ा में आचार्य से अकलतरा (वर्तमान अकलतरा नगर पालिका जांजगीर चाम्पा, छत्तीसगढ़) की 1008 आदिनाथ पंच कल्याणक एवं गजरथ महोत्सव समिति के सदस्य मिलने पहुंचे और महोत्सव में आने के लिए कहा, जो पवन ने स्वीकार कर लिया। पदयात्रा करते हुए जब आचार्य ससंघ रायपुर होते हुए अकलतरा पहुंचे। तब पवन कुमार भी साथ थे। और 18 जनवरी 1982 को अकलतरा के हाई स्कूल मैदान महोत्सव में पवन कुमार दीक्षित हुए और उन्हें क्षुल्लक 105 तरुण सागर महाराज की उपाधि मिली। चातुर्मास आयोजन समिति के कार्यकारी अध्यक्ष सुशील जैन ने बताया,
नहीं रहे जैन मुनि तरुण सागर, संथारा प्रक्रिया से त्यागा शरीर

नहीं रहे जैन मुनि तरुण सागर, संथारा प्रक्रिया से त्यागा शरीर

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दिल्ली (एजेंसी) | क्रांतिकारी और कड़वे प्रवचनों के लिए पहचाने जाने वाले जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज नहीं रहे। शनिवार को उनका परलोकगमन हो गया। वे पीलिया से पीड़ित थे और संथारा कर रहे थे। संथारा जैन धर्म की वह परंपरा होती है, जिसके तहत संत जीवन समाप्ति को लक्ष्य मानकर अन्न-जल त्याग देते हैं। गुरु पुष्पदंत सागर से आज्ञा मिलने के बाद तरुण सागर ने शरीर का त्याग किया। उन्होंने 13 की उम्र में संन्यास लिया था। 20 की उम्र में मुनि की दीक्षा ली। मध्यप्रदेश, हरियाणा और दिल्ली विधानसभा में भी प्रवचन दिए। मुनिश्री को बचपन में माता-पिता मुन्ना कहकर बुलाते थे। एक रोज किसी दुकान पर जलेबी खाते हुए उन्होंने पुष्पदंत सागर के प्रवचन की आवाज सुनी। इतना प्रभावित हुए कि उनसे मिलने गए। यहीं से मुनिश्री बनने का सफर शुरू हुआ। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); नहीं रहे जैन मुनि तरुण सागर, सं