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कौन है महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव, जिसका जिक्र पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में किया, जानिए आखिर क्यों उनकी हत्या कर दी गई

कौन है महाराजा प्रवीर चंद्र भंजदेव, जिसका जिक्र पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में किया, जानिए आखिर क्यों उनकी हत्या कर दी गई

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जगदलपुर (एजेंसी) | देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज बस्तर के जगदलपुर में छत्तीसगढ़ चुनाव 2018 का प्रचार करने आए है। उन्होंने अपने भाषण में कांग्रेस पर तीखा प्रहार करते हुआ कहा कि कांग्रेस ने हमेशा से ही आदिवासियों पर अत्याचार किया है, उनका मज़ाक उड़ाया है। नक्सलियों को विकास की रह में रोड़ा बताते हुए कहा कि कांग्रेस नक्सलियों की हितैषी है। वो नहीं चाहती कि आदिवासियों का विकास हो। अपने भाषण में पीएम मोदी ने बस्तर के महाराजा प्रवीर चंद्रभंज देव का जिक्र करते हुए कहा कि आदिवासियों का हित चाहने वाले नेता थे। (adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({}); कौन थे प्रवीर चंद्रभंज देव रियासत काल के प्रथम उड़िया और अंतिम काकतिया शासक प्रवीर चन्द्र भंजदेव आधुनिक बस्तर को दिशा प्रदान करने वाले पहले युगपुरुषों में से एक हैं। सन 1947 में भारत की आज़ादी के बाद मध्यप्रदेश के बस्तर क्षेत्र में (उ
राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – V

राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – V

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आज हम राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया सीरीज की आखिरी कड़ी पेश कर रहे है। इसमें पढ़िए किस तरह राजा प्रवीर समेत अनेको आदिवासियों को बड़ी ही निर्ममता से गोलियों से भूनकर मौत के घाट उतर दिया गया। इस कहानी के पिछले भाग में आपने पढ़ा था कि किस तरह प्रवीर पर बस्तर को नागालैंड बनाने तथा हिंसक प्रवृत्तियों को भडकाने के आरोप लगते रहे हैं तथापि गंभीर विवेचना करने पर ज्ञात होता है कि उनके अधिकतम आन्दोलन शांतिप्रिय तथा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की परिधि में ही थे। 1964 ई. में प्रवीर ने पीपुल्स वेल्फेयर एसोशियेशन की स्थापना की। 12 जनवरी 1965 को प्रवीर ने बस्तर की समस्याओं को ले कर दिल्ली के शांतिवन में अनशन किया था। गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा द्वारा समस्याओं का निराकरण करने के आश्वासन के बाद ही प्रवीर ने अपना अनशन तोडा था। 6 नवम्बर 1965 को आदिवासी महि
राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – IV

राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – IV

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एक समय था, जब बस्तर भारत का सबसे बड़ा जिला था। एक संभाग के रूप में वह आज भी देश के सबसे बड़े संभागों में से एक है। इसमें कुल चार जिले शामिल हैं – बस्तर, दंतेवाड़ा, कांकेर और कोंडागांव। यहां की प्रमुख बोली गोंडी और उसकी उपबोली हल्बी है। हल्बी से याद आया कि हल्बी गीतों में भंजदेव का इतिहास समाया हुआ है। इस काकतीय वंश के प्रथम राजा अन्नमदेव थे और इस अन्नमदेव को हल्बी गीतों में चालकी राजा कहा जाता है। चालक का अर्थ हुआ चालुक्य। यह सर्वविदित है कि चालुक्यों से ही काकतीयों का विस्तार हुआ है। राजा प्रवीर की कहानी के पिछले भाग में आपने पढ़ा था कि किस तरह मालिक मकबूजा की लूट आधुनिक बस्तर में हुए सबसे बडे भ्रष्टाचारों में से एक था जिसकी बारीकियों को सबसे पहले उजागर प्रवीर ने ही किया था। राजा ने इस भ्रष्टाचार और संशोधन का व्यापक विरोध किया। हुक्मरान नेताओ और महत्वकांक्षी नौकरशाहों ने अपने हितो को सा
राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – III

राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – III

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आजादी के समय भारत में लगभग 565 रियासत थीं, जिनके शासक नवाब या राजा कहलाते थे। आजाद भारत की कई प्रमुख समस्याओं में एक समस्या इन रियासतों के विलय की भी थी। ऐसे कई राजा या नवाब थे जो आजादी और विलय को देशहित में मानते थे। इसीलिए कुछ रियासतों को छोड़ कर अधिकांश रियासतों ने स्वेच्छा से भारत के संघीय ढांचे का हिस्सा बनना स्वीकार कर लिया। 15 दिसंबर 1947 को सरदार वल्लभभाई पटेल ने मध्यप्रांत की राजधानी नागपुर में छत्तीसगढ़ की सभी 14 रियासतों के शासको को भारत संघ में शामिल होने का आग्रह किया। महाराजा प्रवीरचंद्र भंज देव ने आदिवासियों के विकास के लिए विलय को स्वीकृति प्रदान करते हुए स्टेटमेंट ऑफ़ सबसेशन पर हस्ताक्षर कर दिए। इस तरह 1 जनवरी 1948 में बस्तर के मध्यप्रांत में विलय होने की औपचारिक घोषणा हुई और 9 जनवरी 1948 में बस्तर मध्यप्रांत का हिस्सा बन गया। बस्तर और कांकेर की रियासतों को मिलकर बस्तर जिल
राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – II

राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – II

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युवा प्रवीर चंद्र भंज देव की एक दुर्लभ तस्वीर  राजा प्रवीर चंद्र भंजदेव ने आदिवासियों के हक के लिए संघर्ष किया। वे आजाद भारत से बहुत उम्मीद रखने वाले रौशनख्याल राजा थे। उन्हें लगता था कि आजाद भारत में आदिवासियों का शोषण अंग्रेजों की तरह नहीं होगा। वे मानते थे कि आदिवासियों को उनकी जमीन पर बहाल करना अब आसान होगा। साथ ही आदिवासियों को भी विकास की प्रक्रिया का हिस्सा बनने का अवसर प्राप्त होगा। एक तरह से वे आजादी को बस्तर के पूर्ण विकास के लिए एक बेहतरीन अवसर के रूप में देखते थे। नए रंग और देश की आजादी व रियासतों के विलय से बस्तर नरेश और काकतीय वंश के अंतिम राजा प्रवीर चंद भंजदेव बहुत आशान्वित थे। प्रवीर के सामाजिक जीवन की पहली झलक मिलती है सन 1950  में जगदलपुर राजमहल परिसर में आयोजित मध्यप्रादेशिक हिंदी साहित्य सम्मलेन में, जिसमे उन्होंने आदिवासी समाज, उनकी शिक्षा और विकास को लेकर अपने वि
राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – I

राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – I

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रियासत काल के प्रथम उड़िया और अंतिम काकतिया शासक प्रवीर चन्द्र भंजदेव आधुनिक बस्तर को दिशा प्रदान करने वाले पहले युगपुरुषों में से एक हैं। सन 1947 में भारत की आज़ादी के बाद मध्यप्रदेश के बस्तर क्षेत्र में (उस समय बस्तर मध्यप्रदेश का हिस्सा थी।) राजा प्रवीर चंद्र भंज देव के नेतृत्व में आदिवासी आंदोलन कांग्रेस के लिए चुनौती बनता जा रहा था। वे बस्तर के जनजातीय लोगों के अधिकारों के लिए लड़े। बाद में वे 1957 के आम चुनाव जीतकर अविभाजित मध्य प्रदेश विधान सभा के जगदलपुर विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। वे अपने लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय थे, क्योंकि उन्होंने स्थानीय जनजातीय का मुद्दा उठाया और इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों के शोषण के खिलाफ राजनीतिक नेतृत्व प्रदान किया। भूमि सुधारों में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाया और इस प्रकार वे तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस के लोगों द्वारा खतरा म
सत्ता और सियासत: क्या राजनैतिक हत्याकांड ही छत्तीसगढ़ की सियासत का आधार है?

सत्ता और सियासत: क्या राजनैतिक हत्याकांड ही छत्तीसगढ़ की सियासत का आधार है?

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रायपुर (एजेंसी) | छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2018 दिसम्बर में होने को है। और एक बार भी सियासी घमासान शुरू हो चुका है। छत्तीसगढ़ को बने 18 साल हो चुके है। छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्ज़ा देने का श्रेय  प्रधानमंत्री स्व. श्री अटल बिहारी जी को है। सन 2000 में छत्तीसगढ़ के अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन अभी भी कुछ तो है जो नहीं बदला है। नक्सलियों का जंगल राज और सियासी हत्याकांड। ये दोनों हमारे प्रदेश के विकास में बहुत बड़ी बाधा है। 1966 राजा प्रवीर चंद्र भंज देव हत्याकांड: संभवतः छत्तीसगढ़ का प्रथम सियासी हत्याकांड सन 1947 में भारत की आज़ादी के बाद मध्यप्रदेश के बस्तर क्षेत्र में (उस समय बस्तर मध्यप्रदेश का हिस्सा थी।) राजा प्रवीर चंद्र भंज देव के नेतृत्व में आदिवासी आंदोलन कांग्रेस चुनौती बनता जा रहा था। वे जनजातीय लोगों के अधिकारों के लिए लड़े। बाद में वे 1957 के