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राजा प्रवीर चंद्र भंज देव: छत्तीसगढ़ के आदिवासियों का वो मसीहा जो राजनीति की भेट चढ़ गया – IV

एक समय था, जब बस्तर भारत का सबसे बड़ा जिला था। एक संभाग के रूप में वह आज भी देश के सबसे बड़े संभागों में से एक है। इसमें कुल चार जिले शामिल हैं – बस्तर, दंतेवाड़ा, कांकेर और कोंडागांव। यहां की प्रमुख बोली गोंडी और उसकी उपबोली हल्बी है। हल्बी से याद आया कि हल्बी गीतों में भंजदेव का इतिहास समाया हुआ है। इस काकतीय वंश के प्रथम राजा अन्नमदेव थे और इस अन्नमदेव को हल्बी गीतों में चालकी राजा कहा जाता है। चालक का अर्थ हुआ चालुक्य। यह सर्वविदित है कि चालुक्यों से ही काकतीयों का विस्तार हुआ है।

राजा प्रवीर की कहानी के पिछले भाग में आपने पढ़ा था कि किस तरह मालिक मकबूजा की लूट आधुनिक बस्तर में हुए सबसे बडे भ्रष्टाचारों में से एक था जिसकी बारीकियों को सबसे पहले उजागर प्रवीर ने ही किया था। राजा ने इस भ्रष्टाचार और संशोधन का व्यापक विरोध किया। हुक्मरान नेताओ और महत्वकांक्षी नौकरशाहों ने अपने हितो को साधने के लिए राजा प्रवीर के विचलित मस्तिष्क और पागल होने के प्रचार करते रहे। आदिवासी विरोधी सरकारी नीतियों के खिलाफ जब पूर्व राजा की सक्रियता बढ़ गई तब 11 फरवरी 1961 को राज्य विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाकर राजा प्रवीर को धनपूंजी गांव से गिरफ्तार कर लिया गया। इसके तुरंत बाद कार्यवाही करते हुए “प्रिवेंटिंग डिटेंशन एक्ट” के तहत उन्हें गिरफ्तार कर नरसिंहपुर जेल ले जाया गया। इसके अगले ही दिन तत्कालीन केंद्र की कांग्रेस सरकार ने कार्रवाई आगे बढ़ाते हुए 12 फरवरी 1961 को राष्ट्रपति के आज्ञापत्र के माध्यम से प्रवीर के भूतपूर्व राजा होने की मान्यता समाप्त कर दी। राजा के समर्थन में लौहण्डीगुडा तथा सिरिसगुड़ा में आदिवासियों द्वारा व्यापक प्रदर्शन किया गया था। आदिवासियों में राजा के प्रति लोकप्रियता से चिढ़कर प्रशासन ने आदिवासियों का दमन करने का निश्चय किया। जिला प्रशासन की जिद और प्रवीर पर हो रही ज्यादतियों का परिणाम 31 मार्च 1961 का लौहंडीगुड़ा गोली काण्ड़ था, जहाँ बीस हजार की संख्या में उपस्थित विरोध कर रहे आदिवासियों पर निर्ममता से गोली चलाई गयी थी, जिसमें अनेक आदिवासी मारे गये।




आजाद भारत में ये पहली बार था जब इतने सारे आदिवासियों को गोलियों से भून दिया गया। राजा प्रवीर को लग चुका था कि हमें अलग से राजनीतिक राह बनानी होगी। शासन द्वारा बार-बार स्वयं को निशाना बनाए जाने के बाद उन्होंने परिथितियों का सामना पहले से अधिक मुखरता के साथ किया। उन्होंने पुनः जनशक्ति के रूप में स्वयं को उभारा।

4 जुलाई 1961 को पाटन, राजस्थान के महाराजा उदय सिंह की पुत्री शुभराज कुमारी (जन्म 1930 – मृत्यु 11 सितंबर 1996) से विवाह करने के पश्चात् उसी वर्ष बस्तर दशहरे को अपने शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बनाया। प्रशासन की नाराजगी के बाद भी बस्तर के दशहरे के इतिहास में इतनी विशाल भीड़ कभी देखि नहीं गई थी। जहाँ पुरे बस्तर से 5 लाख आदिवासी जमा हो गए।

इसलिए सन 1962 तक आते-आते वे पूरे देश के आदिवासियों के लिए एक आदिवासी पार्टी की नींव रखने के विषय में विचार करने लगे। सारी व्यवस्था कर ली गयी थी। और इसी साल फरवरी 1962 में होने वाले विधान सभा में राजा प्रवीर और उनके साथियों ने विधान सभा चुनाव का सामना किया और कांकेर तथा बीजापुर को छोड पर सम्पूर्ण बस्तर में महाराजा पार्टी के प्रत्याशी विजयी रहे। उन्होंने बस्तर के दस विधानसभा सीटों में से 9 पर बड़ी जीत हासिल कर ली। उनके बढ़ते राजनीतिक प्रभाव से देश की सबसे बड़ी सत्ता परेशान हो गई। राजा की यह जीत सरकार को आदिवासियों के जनसंहार का प्रत्युत्तर था।

इस बीच अनेक मुद्दों जैसे जबरन लेवी वसूली, आदिवासी महिलाओं से पुलिस का दुर्व्यवहार, भुखमरी, दण्डकारण्य प्रोजेक्ट इत्यादि पर भंजदेव का सरकार से सामना होता रहा। आदिवासी मुद्दों को लेकर वे अनेक अनशन और शांतिपूर्ण प्रदर्शन भी किये। भंजदेव प्रशासन के लिए हमेशा चुनौती बने रहे, क्योंकि वे हमेशा जन मुद्दों पर सरकार को घेरते रहे। आदिवासियों के बीच उनकी लोकप्रियता भी सरकार को अखर रही थी। भंजदेव के रहते बस्तर में जंगल काटने वाले या खनिज निकालने वाले उद्योगपतियों का घुसना मुश्किल हो गया था। वह इसलिए भी कि उद्योगपतियों के तरफ से तमाम अनियमितताएं की जा रही थी, जिसे सरकार में बैठे लोगों का स्पष्ट समर्थन मिल रहा था। सरकार किसी तरह से इन समस्याओं से निजात पाना चाहती थी।

बस्तर प्रिंस्ली फ्लैग, 14वी शताब्दी (बाए) बस्तर स्टेट फ्लैग, 1948 (दाए)

तभी 6 मई 1963 को जगदलपुर की गलियों में चीखते-चिल्लाते सैकड़ो आदिवासी दौड़ते हुए पाए गए। इसी शाम कोर्ट ऑफ वार्ड्स के ऑफिस में बस्तर स्टेट के पुराने झंडे को किसी ने लहरा दिया था। 30 जुलाई 1963 को प्रवीर की सम्पत्ति कोर्ट ऑफ वार्ड्स से मुक्त कर दी गयी।

प्रवीर ने अपने समय में बस्तर अंचल के वास्तविक मुद्दों को उठाया और उनकी राजनीति ही जनवादी रही। वे आदिवासी और गैर आदिवासी के बीच की खाई में भी सक्रिय नज़र आते है। वे तत्कालीन सरकार की हर उन नीतियों पर स्पष्ट विचार रखते थे जिनका सम्बन्ध बस्तर से होता था।




दंडकारण्य प्रोजेक्ट जिसके तहत पूर्वी पाकिस्तान (आज का बांग्लादेश) से आये शरणार्थियों को बस्तर के विभिन्न भागो में बसाया गया। उन शरणार्थियों और उनकी सांस्कृतिक पक्ष को लेकर प्रवीर को गहरी आपत्ति थी। इस योजना के कार्यान्वयन में भी वे रेलवे और दूसरे सरकारी प्रोजेक्ट में स्थानीय लोगो के बजाए बाहर से लाए गए कामगारों, रेजा कुली मज़दूरों आदि को लेने के भी विरुद्ध थे। जिले की आदिवासी जनता उनकी एक आवाज़ पर एकत्रित होने और बलिदान देने को तत्पर थे।

यद्यपि प्रवीर में कुछ नैसर्गिक कमियां थी। सितम्बर 1963 को प्रवीर ने एक हाथ रिक्शा खींचने वाले मज़दूर का हाथ अपनी  से कटार लहूलुहान कर दिया। वह मज़दूर जिसका नाम मोतीलाल था, उसकी यही गलती थी की उसने भेष बदल कर दान लेने वालो की पंक्ति में दूसरी बार घुस गया। लेकिन राजा ने उसे पहचान लिया और गुस्से में उस पर तलवार चला दी। प्रवीर इस मामले में गिरफ्तार किए गए और स्वाभाविक आलोचना के शिकार हुए। बाद में उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया गया। तथापि जबलपुर हाई कोर्ट ने उन्हें इस मामले से बाद में बरी कर दिया।

प्रवीर पर बहुधा बस्तर को नागालैंड बनाने तथा हिंसक प्रवृत्तियों को भड़काने के आरोप लगते रहे हैं तथापि गंभीर विवेचना करने पर ज्ञात होता है कि उनके अधिकतम आन्दोलन शांतिप्रिय तथा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की परिधि में ही थे। 1964 ई. में प्रवीर ने पीपुल्स वेल्फेयर एसोसियेशन की स्थापना की। 12 जनवरी 1965 को प्रवीर ने बस्तर की समस्याओं को ले कर दिल्ली के शांतिवन में अनशन किया था। गृहमंत्री गुलजारी लाल नंदा द्वारा समस्याओं का निराकरण करने के आश्वासन के बाद ही प्रवीर ने अपना अनशन तोड़ा था।

6 नवम्बर 1965 को आदिवासी महिलाओं द्वारा कलेक्ट्रेट के सामने प्रदर्शन किया गया जहाँ उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। इसके विरोध में प्रवीर, विजय भवन में धरने पर बैठ गये। 16 दिसम्बर 1965 को आयुक्त वीरभद्र ने जब उनकी माँगों को माने जाने का आश्वासन दिया तब जाकर यह अनशन टूट सका। 8 फरवरी 1966 को पुन: जबरन वहलने की समस्या को ले कर प्रवीर द्वारा विजय भवन में अनशन किया गया। 12 मार्च 1966 को नारायणपुर इलाके में भुखमरी और इलाज की कमी को ले कर प्रवीर द्वारा पुन: अनशन किया गया। प्रवीर के आन्दोलन व्यवस्था के लिये प्रश्नचिन्ह बने हुए थे जिनका दमन करने के लिये आदिवासी और भूतपूर्व राजा के बीच के सबंध को तोडना आवश्यक था।

यही सब वजह है जो बस्तर के आदिवासी दंतेश्वरी देवी और राजा प्रवीर चंद भंजदेव में असीम आस्था रखते हैं। बस्तर के आदिवासियों में राजा प्रवीर चंद भंजदेव के प्रति लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनकी तस्वीर बस्तर के सभी आदिवासियों के घरों में देखने को मिल जाएगी। 75 दिनों तक चलने वाला बस्तर दशहरा, जो विश्व का सबसे अधिक दिनों का पर्व कहा जाता है, के मेले में प्रवीर चंद भंजदेव के फोटो की अप्रत्याशित बिक्री होती है। बस्तर के आदिवासी दंतेश्वरी देवी के साथ इनकी पूजा करते हैं।

कहानी जारी रहेगी। हमें अपनी प्रतिक्रिया अवश्य देवे।



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