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सत्ता और सियासत: क्या राजनैतिक हत्याकांड ही छत्तीसगढ़ की सियासत का आधार है?

रायपुर (एजेंसी) | छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव 2018 दिसम्बर में होने को है। और एक बार भी सियासी घमासान शुरू हो चुका है। छत्तीसगढ़ को बने 18 साल हो चुके है। छत्तीसगढ़ को अलग राज्य का दर्ज़ा देने का श्रेय  प्रधानमंत्री स्व. श्री अटल बिहारी जी को है। सन 2000 में छत्तीसगढ़ के अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन अभी भी कुछ तो है जो नहीं बदला है। नक्सलियों का जंगल राज और सियासी हत्याकांड। ये दोनों हमारे प्रदेश के विकास में बहुत बड़ी बाधा है।

1966 राजा प्रवीर चंद्र भंज देव हत्याकांड: संभवतः छत्तीसगढ़ का प्रथम सियासी हत्याकांड

सन 1947 में भारत की आज़ादी के बाद मध्यप्रदेश के बस्तर क्षेत्र में (उस समय बस्तर मध्यप्रदेश का हिस्सा थी।) राजा प्रवीर चंद्र भंज देव के नेतृत्व में आदिवासी आंदोलन कांग्रेस चुनौती बनता जा रहा था। वे जनजातीय लोगों के अधिकारों के लिए लड़े। बाद में वे 1957 के आम चुनाव जीतकर अविभाजित मध्य प्रदेश विधान सभा के जगदलपुर विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। वे अपने लोगों के बीच बेहद लोकप्रिय थे, क्योंकि उन्होंने स्थानीय जनजातीय का मुद्दा उठाया और इस क्षेत्र के प्राकृतिक संसाधनों के शोषण के खिलाफ राजनीतिक नेतृत्व प्रदान किया। भूमि सुधारों में भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज़ उठाया और इस प्रकार वे तत्कालीन सत्तारूढ़ कांग्रेस के लोगों द्वारा खतरा माना गया।




25 मार्च 1966 को जगदलपुर में अपने राज दरबार में बैठक कर रहे थे जिसमे बड़ी संख्या में आदिवासी भी शामिल थे, उसी दौरान पुलिस ने राजमहल के भीतर प्रवेश किया और अंधाधुंध गोलीबारी की। इस गोलीकांड में राजा प्रवीर चंद्र समेत कई आदिवासियों की मौत हो गयी थी। मगर आधिकारिक तौर पर राजा समेत 12 लोगो की मौत और 20 लोगो को घायल बताया गया। जबकि पुलिस ने 61 राउंड फायर किये थे।

वे प्रवीर चंद्र ही थे जिन्होंने अंग्रेज शासन द्वारा बैलाडीला की कोयले के खदानों को हैदराबाद के निज़ाम के हाथो सौपने के खिलाफ चुनौती दी थी।

राजा प्रवीर के निधन के बाद उनके ही नाम की प्रतिछाया इस्तेमाल करके कांग्रेस अभी भी बस्तर के विधानसभा क्षेत्रो में चुनाव जीतती आयी है।

राजमहल में घुसकर निहत्थे राजा और आदिवासियों पर पुलिस ने गोलीबारी क्यों की ये आज भी रहस्य है और बर्बरता पूर्ण है। क्या बातचीत से समस्या का हल नही निकल सकता था?

2003: छत्तीसगढ़ के अस्तित्व में आने के बाद पहला सियासी हत्याकांड 

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के कोषाध्यक्ष रामावतार जग्गी की रायपुर में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। यह छत्तीसगढ़ के अस्तित्व में आने के बाद पहला राजनैतिक हत्याकांड था। इस हत्याकांड में कई बड़े नेताओ के नाम जुड़े थे। हालांकि इसके बाद कोई कार्यवाही नही हुई।

2013: झीरम घाटी कांड

2013 में नक्सलियों ने एक साथ 30 से ज्यादा नेताओ की हत्या कर झीरम कांड को अंजाम दिया। इसमें विद्याचरण शुक्ल समेत कांग्रेस के करीब 30 कद्दावार नेता मरे गए थे। एनआईए की जाँच बंद हो चुकी है। जबकि न्यायिक रिपोर्ट ने अब तक रिपोर्ट ही नहीं दी है।

नोट: लेखक गोंडवाना एक्सप्रेस से जुड़े हुए है। यह लेख उनके अपने विचार है।



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