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कांग्रेस ने रमन सिंह पर मनरेगा घोटाला करने का लगाया आरोप; कहा, छत्तीसगढ़ प्रदेश भाजपा के नेता दो राज्यों को बर्बाद कर रहे है

रायपुर (एजेंसी) | छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने खेतिहर मज़दूरों को तबाह करने के लिए देश के सभी राज्यों में पहला स्थान हासिल किया है। सरकार की अपनी रिपोर्ट के मुताबिक़ छत्तीसगढ़ मनरेगा के भुगतान में 26वे स्थान पर रहा।
इतना ही नहीं, रमन सिंह मनरेगा मज़दूरों को पिछले 14-15 सालों से 150 दिन रोज़गार देने का वादा और दावा कर रहे थे। लेकिन हक़ीक़त यह रही कि राज्य सरकार केवल 47 दिन का रोज़गार मनरेगा मज़दूरों को दे पाई और यह भुगतान भी रमन सिंह सरकार ने समय से नहीं किया।

नतीजतन छत्तीसगढ़ में 41,20,054 पंजीकृत मज़दूर अपनी मज़दूरी के लिए आज दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। मनरेगा मज़दूरों की थाली को ख़ाली करने के पीछे सरकार के सामने कोई वित्तीय संकट प्रमुख वजह नहीं थी बल्कि रमन सिंह की नाक के नीचे चल रहे अधिकारियों के भ्रष्टाचार ने मनरेगा मज़दूरों को इस हाल में पहुँचा दिया। रमन सिंह सरकार के इन कारनामों की बदौलत ही छत्तीसगढ़ मनरेगा के मामले में 26वें पायदान पर पहुँच गया।




विधान सभा के बजट सत्र में कांग्रेस ने मनरेगा मज़दूरों का भुगतान नहीं होने का मुद्दा लगातार उठाया, इस पर विभागीय मंत्री श्री अजय चंद्राकर ने बक़ाया राशि नहीं होने की बात सदन को बताई। सरकार के इस झूठे बयान पर सत्ता धारी भाजपा के भी कुछ विधायकों ने आपत्ति दर्ज की थी। केंद्र सरकार की रिपोर्ट ने इस हक़ीक़त को सच साबित किया। रिपोर्ट के अनुसार मोदी सरकार ने छत्तीसगढ़ के मनरेगा के बजट में मात्र 2.7% की बढ़ोतरी की, जबकि कांग्रेस की यूपीए सरकार ने इस बजट में 9% का इज़ाफ़ा किया था।

रमन सिंह सरकार ने यह झूठ अपने उस वादे और दावे को छुपाने के लिए बोल था जिसमे सरकार ने 150 दिन रोज़गार देने की घोषणा की थी, जबकि हक़ीक़त में मनरेगा मज़दूरों को सिर्फ़ 47 दिन का रोज़गार मिल पाया। यह मनरेगा मज़दूरों के साथ किसी भी राज्य में किए गए सबसे बड़े धोखे का कीर्तिमान है।

अगर किसी मज़दूर के पूरे परिवार को रोज़गार दिलवाने की बात की जाए तो एक परिवार को मात्र 22 दिन का रोज़गार मिल पाया और यह बात रमन सिंह ने अपनी होर्डिंग में भी ख़ुद लिखी है। मनरेगा के तहत कांग्रेस की यूपीए सरकार ने छत्तीसगढ़ को 2010-12 के बीच ₹2075.65 करोड़ जारी किए थे। अन्य राज्यों की तुलना में छत्तीसगढ़ को मिली इतनी भारी-भरकम राशि के उपयोग का ज़मीन पर कोई काम नहीं दिखता है और न ही रमन सिंह सरकार अब तक इसके ख़र्च का कोई ब्योरा पेश कर पाई है।

तत्कालीन केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री श्री जयराम रमेश ने लगभग हर महीने राज्य का दौरा कर मनरेगा की स्तिथि का रिपोर्ट कार्ड रमन सिंह सरकार से माँगा, लेकिन रमन सिंह ने इसका कोई ब्योरा न तो केंद्र की सरकार को दिया न राज्य की विधान सभा को। रमन सिंह सरकार ने मनरेगा की राशि से जो सड़क–पुलिया–नाली–छोटे बाँध निर्माण के दावे किए थे, वे सब काग़ज़ी शेर ही साबित हुए और मज़दूरों के हिस्से की राशि भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गई।

पूरी योजना में आँकड़ों के फ़र्ज़ीवाडे का इस्तेमाल करने में भी रमन सिंह सरकार को कोई शर्म नहीं आई और इन आँकड़ों की बदौलत सरकार ने बेहतर क्रियान्वयन के मामले में कांकेर सहेत तमाम जिलों को पुरस्कार प्राप्त करवा दिए।
लेकिन, मज़दूरों की बादहाली इन आँकड़ों और पुरस्कारों की हक़ीक़त को उजागर करती है।

कांकेर, कवर्धा, राजनांदगाँव, दशपुर, बलरामपुर और बस्तर सहित जहाँ-जहाँ केंद्र सरकार की टीमों ने निरीक्षण किया, उन सभी जगहों पर काम की गुणवत्ता बेहद घटिया पाई गई और फ़र्ज़ी बिलों के ज़रिए भुगतान की बात भी सामने आई।

नोटबंदी ने भी नहीं बख़्शा मनरेगा मज़दूरों को

मोदी सरकार की नोटेबंदी ने छत्तीसगढ़ के 20,000 से अधिक मनरेगा मज़दूरों की रोज़ी-रोटी छीन ली। नोटबंदी के कारण देश भर में मची अफ़रा-तफ़री के बीच छत्तीसगढ़ के भी मनरेगा मज़दूरों का भुगतान आज तक लम्बित पड़ा है। यह राशि अब लगभग ₹300 करोड़ तक पहुँच गई है।

नोटबंदी के बाद मज़दूरों के ऑनलाइन भुगतान की मजबूरी ने राज्य के 20,000 मज़दूरों की रोज़ी-रोटी को छीन लिया।
बस्तर के सुदूल जिले बीजापुर, नारायणपुर, सुकमा और दंतेवाड़ा में सिर्फ़ 2% मज़दूरों को ही रोज़गार मिल सका।
राज्य में अभी भी दूरथ अंचल बैंकिंग सुविधा का अभाव है जिसकी वजह से मनरेगा मज़दूरों के ऑनलाइन भुगतान की प्रक्रिया सुचारू नहीं हो सकी है।




आकाल में भी 13,00,000 मनरेगा मज़दूरों को रमन सिंह सरकार रोज़गार देने में रही नाकाम, जिससे सरकार का मज़दूर विरोधी चेहरा उजागर हुआ। राज्य में साल 2016-17 में 38,00,000 मज़दूर परिवारों के 82,00,000 मज़दूरों को मनरेगा के तहत पंजीकृत किया गया, इनमे से 55,00,000 को ही रोज़गार मिल सका। 13,00,000 मज़दूर आज भी बेरोज़गार हैं। जिन्हें काम मिला भी उनमें से सिर्फ़ 72904 मज़दूरों को ही 100 दिन से ज़्यादा काम मिल पाया, जबकि नियम के अनुसार हर पंजीकृत मज़दूर को कम से कम 150 दिन का रोज़गार मिलना अनिवार्य है।

सरकार के इस मज़दूर विरोधी चेहरे के उजागर होने के बाद भारी तादात में मनरेगा मज़दूर दूसरे राज्यों में पलायन करने के लिए मजबूर हो गए। ख़ुद मुख्यमंत्री रमन सिंह ने विधान सभा में 2016  में यह बयान दिया कि मौजूदा हालात को देखते हुए सरकार ने100 दिन के रोज़गार की अवधि को बढ़ा कर 200 दिन कर दिया है। इसके ठीक एक साल बाद, मुख्यमंत्री के दावों की हक़ीक़त सरकारी आँकड़ो ने खोलते हुए उजागर किया कि मज़दूरों को 200 दिन के बजाय सिर्फ़ 37 दिन काम मिला।

मशीनों का प्रयोग

छत्तीसगढ़ में अनगिनत शिकायतें हैं, जिसमें कागज़ों में तो काम मनरेगा के तहत होना दर्ज है लेकिन वास्तव में तालाब गहरीकरण से लेकर नए तालाबों के निर्माण तक बहुत से काम मशीनों के ज़रिए पूरे कर लिए गए। इससे मज़दूरों को मिलने वाले रोज़गार का नुक़सान तो हुआ ही, इस कार्य के भुगतान के लिए की गई सरकारी धांधली अलग से हुई। नतीजा यह हुआ कि छत्तीसगढ़ से पलायन यथावत जारी है। राज्य के मज़दूरों को फसल की कटाई के बाद सपरिवार रोज़गार की तलाश में दूसरे प्रदेशों में जाना पड़ता है। वहां जो उनका शोषण होता है, वह अलग त्रासदी है।

नरुआ – गरुआ – घरुआ – बाड़ी, छत्तीसगढ़ की चार चिन्हारी

छतीसगढ़ में 15 साल के रमन सिंह के कुशासन के बाद कांग्रेस ने अब ग़रीब खेतिहर मज़दूरों को बदहाली के दुशचक्र से निकालने के लिए योजना बध्य तरीक़े से निकालने की तय्यारी पूरी कर ली है। कांग्रेस ने इसके लिए गाँव सम्रिधि योजना को उसकी मूल भावना के अनूरूप अमलिजामा पहनाने के लिए समयबद्धयोजना तैयार की है। इसका मक़सद मज़दूर और मज़दूरों से जुड़े जन-धन और पशु-धन को एक साथ समृध किया जाएगा। इसका सूत्र नरुआ – गरुआ – घुरुआ – बाड़ी होगा। इसमें 4 मोर्चों पर काम किया जाएगा। किसानों के हर खेत तक पानी पहुँचाने के लिए छोटी-छोटी नहरों को दुरुस्त किया जाएगा, इसके बाद कृषि संसाधनो को पशु संरक्षण से जोड़ते हुए पशु-धन को इस योजना का हिस्सा बनाया जाएगा।साथ ही इसमें खेती किसानी के सबसे प्रमुख संसाधन, चारा-भूसा-गोबर आदि के उचित रख-रखाव के उचित इंतज़ाम किए जाएंगे।

कांग्रेस की सरकार कृषि कार्यों, जल संरक्षण और पशुधन की देखभाल सभी को मनरेगा से जोड़ेगी। इससे पशुधन के आवारा भटकने की समस्या भी ख़त्म होगी, फसलों की चराई की समस्या दूर होगी और गांवों में बेरोज़गारी भी ख़त्म होगी।



RO No - 11069/ 14
CM Bhupesh Bhagel Mandi ko Maar

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