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बेटे ने मानी माँ की अपील, कांग्रेस प्रत्याशी देवती कर्मा के बेटे छविंद्र कर्मा ने वापस लिया नाम

दंतेवाड़ा (एजेंसी) | छत्तीसगढ़ में पहले चरण के चुनाव में आज नाम वापसी के अंतिम दिन प्रदेश के दोनों बड़े दलों (भाजपा और कांग्रेस) में उठ रहे बगावत के सुर शांत हो गए हैं। दंतेवाड़ा जिले में भाजपा और कांग्रेस का चल रहा अंदरूनी टकराव शुक्रवार को खत्म हाे गया। एक अोर जहां मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने बागी हुए वरिष्ठ नेता चैतराम अटामी को मना लिया, वहीं कांग्रेस में अपनी ही मां के खिलाफ खड़े हुए छविंद्र कर्मा भी घर लौट आए हैं।




वैसे तो कांग्रेस के लिए यह दंतेवाड़ा से बहुत बड़ी और राहत देने वाली खबर है। कांग्रेस की प्रत्याशी देवती कर्मा के बेटे छविंद्र कर्मा ने अपना नामांकन वापस ले लिया है। आपको बता दे कि छविंद्र कर्मा अपनी मां के विरुद्ध दंतेवाड़ा सीट से निर्दलीय पर्चा दाखिल किया था। इससे पहले छविंद्र कर्मा को समाजवादी पार्टी ने अपना प्रत्याशी बनाने का ऐलान किया था, लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया।

इसके बाद से ही कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं ने छविंद्र को मनाने की कोशिश की थी, लेकिन वह चुनाव लड़ने पर अडिग थे। यहाँ तक कि पीसीसी चीफ भूपेश बघेल ने छविंद्र से बात की थी, लेकिन फिर भी उन्होंने नामांकन पत्र भरा था। छविंद्र के नामांकन वापस लेने को लेकर शुक्रवार सुबह तक संशय बरकरार था।

राहुल गांधी से बात कर मां पहुंची छविंद्र को मनाने

इसके बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने देवती कर्मा की राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी से बात कराई। उनसे बात होने के बाद सुबह छविंद्र की मां देवती कर्मा भी बेटे को मनाने के लिए उसके घर पहुंची। काफी देर तक बातचीत होने के बाद आखिरकार दोनों मां-बेटे साथ में कलेक्ट्रेट निकले और वहां जाकर छविंद्र ने अपना नामांकन वापस ले लिया।

दरअसल छविंद्र पिछली बार भी चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन कांग्रेस ने सहानुभूति लहर देखते हुए महेंद्र कर्मा की पत्नी देवती कर्मा को टिकट दिया था। और इस बार छविंद्र कर्मा ने अपना दावेदारी फार्म जमा किया था, उम्मीद थी कि पार्टी उन्हें टिकट देगी। लेकिन एक बार फिर छविंद्र की दावेदारी को दरकिनार करते हुए देवती कर्मा को ही प्रत्याशी बनाया गया। लिहाजा नाराज होकर छविंद्र ने निर्दलीय ही चुनावी ताल ठोक दिया। हालांकि देवती कर्मा पहले से ये बोलती रही थी कि वो अपने बेटे को मना लेगी और वो उनके खिलाफ चुनाव नहीं लड़ेंगे।

अंदरूनी कलह खत्म हुई 

दंतेवाड़ा को हमेशा से ही कांग्रेस का गढ़ माना जाता रहा है। छत्तीसगढ़ गठन से पहले भी यहां कांग्रेस का कब्जा था। तब महेंद्र कर्मा विधायक थे। राज्य बनने के बाद भी यह सीट कांग्रेस के पास ही रही। प्रदेश के वर्ष 2003 में हुए पहले चुनाव में महेंद्र कर्मा फिर से विधायक बने। इसके बाद वर्ष 2008 में पहली बार यह सीट भाजपा के खाते में गई और भीमा मंडावी करीब 5500 वोटों से जीते।

मई 2013 में हुए झीरम के नक्सली हमले में महेंद्र कर्मा की मौत हो गई। उसके बाद कांग्रेस ने 2013 के चुनाव में उनकी पत्नी देवती कर्मा को टिकट दिया और वह जीत कर सदन में पहुंची। देवती कर्मा के बेटे छविंद्र पिता की मौत के बाद से ही टिकट के लिए दावेदारी करते आ रहे थे।

भाजपा की भी अंदरूनी कलह खत्म हुई

वहीं भाजपा से वरिष्ठ नेता चैतराम अटामी टिकट मांग रहे थे। इसको लेकर जिले में पार्टी दो खेमों में बंटती नजर आ रही थी। इसे देखते हुए सीएम रमन सिंह ने अटामी को गुरुवार को रायपुर बुलाया था। यहां पर अपने समर्थकाें के साथ पहुंचे अटामी को मनाने में रमन सिंह सफल रहे।

दोनों दलो में अब सीधी टक्कर

कांग्रेस और भाजपा दोनों का मानना था कि पार्टी में चल रही अंर्तकलह का नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसका बड़ा फायदा विरोधियों को मिलेगा। चैतराम अटामी का क्षेत्र में अपनी पकड़ है। वहीं एक ही परिवार से दो सदस्यों के खड़े होने से कांग्रेस को वोट बंटने का संकट दिखाई दे रहा था।



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