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महाधिवक्ता विवाद: भाजपा-जोगी कांग्रेस भी कूदी, सरकार ने कहा, ‘विवाद नहीं चाहते, नियुक्ति नियमों के आधार की गई है’

बिलासपुर (एजेंसी) | बिलासपुर हाइकोर्ट में महाधिवक्ता की नियुक्ति पर चल रहे विवाद ने शनिवार को तूल पकड़ लिया। इसमें आज भाजपा व जोगी कांग्रेस भी कूद पड़ी। भाजपा ने इसे संवैधानिक संकट बताया तो जोगी कांग्रेस ने सरकार की कार्य प्रणाली पर उंगली उठाई। जबकि राज्य सरकार की ओर से प्रभारी विधि मंत्री मोहम्मद अकबर ने कहा है कि नियुक्ति पूरी प्रक्रिया और नियमों के आधार की गई है। नियुक्ति में बाकायदा राज्यपाल का अनुमोदन भी लिया गया है। सरकार इस विषय पर विवाद नहीं चाहती।

अकबर ने कहा कि दस्तावेजों के आधार पर निर्णय हुआ है, इसलिए इसे विवादित नहीं किया जाना चाहिए। वन विभाग की बैठक के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए विधि मंत्री ने कहा कि कनक तिवारी ने काम करने की अनिच्छा जताई थी। इसलिए नए महाधिवक्ता सतीशचंद्र वर्मा की नियुक्ति की गई है। राज्यपाल के अनुमोदन के पश्चात ही नई नियुक्ति की गई है। महाधिवक्ता का अपने पद पर बने रहना या हटाया जाना राज्यपाल के निर्देश पर होता है। महाधिवक्ता के इस्तीफा दिए बगैर इस्तीफा मंजूर कर लिये जाने संबंधी चर्चाओं को लेकर अकबर ने स्पष्ट किया कि पूर्व महाधिवक्ता के पद छोड़ने को लेकर अपनी अनिच्छा को लेकर कोई बात सामने आई होगी तभी निर्णय लिया गया है।

अमित जोगी ने अटार्नी जनरल को लिखी मामले में चिट्ठी 

करीब दस दिनों से महाधिवक्ता के मामले में सियासत गरम है। उधर, जोगी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अमित जोगी ने सरकार की कार्यशैली पर उंगली उठाई है। उन्होंने देश के अटार्नी जनरल को पत्र लिखा है। इसमें उन्होंने 31 मई को विधि विभाग द्वारा जारी अधिसूचना को निरस्त करने व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ अपनी संवैधानिक शक्तियों के दुरुपयोग करने पर न्यायोचित कार्रवाई की मांग की है। इसमें कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 165 (1) का प्रयोग सिर्फ और सिर्फ महाधिवक्ता के रिक्त पद को भरने के लिए किया जा सकता है। इस पद पर कार्यरत व्यक्ति को पदमुक्त करने का कोई प्रावधान नहीं है।

भाजपा ने खोला मोर्चा

पूर्व मुख्यमंत्री व भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा है कि ये संवैधानिक संकट है। राजभवन ने स्वीकार किया है कि महाधिवक्ता ने इस्तीफा नहीं दिया। मुख्यमंत्री बताएं कि उन्हें किस महाधिवक्ता ने इस्तीफा सौंपा है। भाजपा ने भी अपनी वेबसाइट पर ट्वीट किया है कि ये संवैधानिक संकट नहीं है तो और क्या है। जब राजभवन को त्यागपत्र ही नहीं मिला ताे भूपेश बघेल को किसका त्यागपत्र मिल गया? फिर नए महाधिवक्ता की नियुक्ति भी हो गई। न खाता न बही जो भूपेश कहें वही सही। हे…राम।

संवैधानिक व्यवस्था का मजाक उड़ा रहे 

भाजपा प्रवक्ता श्रीचंद सुंदरानी ने कहा है कि राज्य की कानून व्यवस्था को बिगाड़ने वाली सरकार ने अब संवैधानिक व्यवस्था का मजाक बनाकर रख दिया है। यदि राजनीतिक राग द्वेष के कारण सरकार प्रतिपक्ष के नेताओं अथवा उनसे जुड़े लोगों को प्रताड़ित करेगी और सरकार की मंशा के मुताबिक मामले स्थापित नहीं हो सकेंगे तो इसकी गाज महाधिवक्ता पर गिराई जाए, यह किस नैतिकता के दायरे में आता है।

सरकार बदलापुर की राजनीति कर रही है। उसके मन मुताबिक विपक्ष का उत्पीड़न न होने पर महाधिवक्ता को बदलने का अनोखा प्रमाण उन्होंने पेश किया है। सुंदरानी ने राज्यपाल से इस मामले में सीधे दखल देने का आग्रह करते हुए कहा है कि राज्य के अभिभावक की हैसियत से राज्यपाल को संवैधानिक व्यवस्थाओं का पालन करने के लिए राज्य सरकार को बाध्य करना चाहिए।

नियुक्ति नियमों के आधार पर: अकबर

प्रभारी विधि मंत्री मोहम्मद अकबर ने कहा है कि नियुक्ति पूरी प्रक्रिया और नियमों के आधार की गई है। इस नियुक्ति में बकायदा राज्यपाल का अनुमोदन भी लिया गया है। सरकार इस विषय पर विवाद नहीं चाहती। दस्तावेजों के आधार पर निर्णय हुआ है, इसलिए इसे विवादित नहीं किया जाना चाहिए। वन विभाग की बैठक के बाद मीडिया से बातचीत करते हुए विधि मंत्री ने कहा कि उन्होंने काम करने के लिए अनिच्छा जताई थी, इसलिए नए महाधिवक्ता की नियुक्ति की गई है। राज्यपाल के अनुमोदन के पश्चात ही नई नियुक्ति की गई है।

महाधिवक्ता का अपने पद पर बने रहना या हटाया जाना राज्यपाल के निर्देश पर होता है। महाधिवक्ता के इस्तीफे दिये बगैर इस्तीफा मंजूर कर लिये जाने संबंधी चर्चाओं को लेकर स्पष्ट किया कि पूर्व महाधिवक्ता ने पद छोड़ने को लेकर अपनी अनिच्छा को लेकर कोई बात सामने आई होगी तभी निर्णय लिया गया है। मालूम हो कि हफ्तेभर से महाधिवक्ता के मामले में सियासत गरम है।

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