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नहीं रहे जैन मुनि तरुण सागर, संथारा प्रक्रिया से त्यागा शरीर

जन्म: 26 जून 1967 (दमोह)  निधन: 1 सितंबर 2018 (दिल्ली)

दिल्ली (एजेंसी) | क्रांतिकारी और कड़वे प्रवचनों के लिए पहचाने जाने वाले जैन मुनि तरुण सागर जी महाराज नहीं रहे। शनिवार को उनका परलोकगमन हो गया। वे पीलिया से पीड़ित थे और संथारा कर रहे थे। संथारा जैन धर्म की वह परंपरा होती है, जिसके तहत संत जीवन समाप्ति को लक्ष्य मानकर अन्न-जल त्याग देते हैं। गुरु पुष्पदंत सागर से आज्ञा मिलने के बाद तरुण सागर ने शरीर का त्याग किया। उन्होंने 13 की उम्र में संन्यास लिया था। 20 की उम्र में मुनि की दीक्षा ली। मध्यप्रदेश, हरियाणा और दिल्ली विधानसभा में भी प्रवचन दिए।

मुनिश्री को बचपन में माता-पिता मुन्ना कहकर बुलाते थे। एक रोज किसी दुकान पर जलेबी खाते हुए उन्होंने पुष्पदंत सागर के प्रवचन की आवाज सुनी। इतना प्रभावित हुए कि उनसे मिलने गए। यहीं से मुनिश्री बनने का सफर शुरू हुआ।



मुनिश्री तरुण सागर कहते थे- 50 साल में भोजन बदल दो, 100 साल बाद मकान गिरा दो और हजार साल बाद धर्म को जला दो। क्योंकि धर्म में समय के साथ कई बुराइयां शामिल हो जाती हैं। ‘कड़वे प्रवचन’ नाम से मुनिश्री की 9 किताबें आई हैं। जैन मुनि ने कहा था- देश में हर तीसरा बाबा फर्जी है। जिन बाबाओं पर दुष्कर्म के आरोप सिद्ध हो गए हैं उन सभी का पुतला बनाकर दशहरे पर दहन करना चाहिए जिससे समाज में एक संदेश जाए। कड़वे प्रवचन का सातवां, आठवां भाग दुनिया की सबसे ऊंची (51 फीट) पुस्तक के तौर पर गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।



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