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स्वामी विवेकानंद की स्मृति में स्मारक बनाकर बूढ़ापारा स्थित भवन को किया जाएगा संरक्षित, दर्रेकसा के पास स्थित गुफा को भी पर्यटन क्षेत्र बनाया गया

harinath-academy-where-swami-vivekanand-livedरायपुर | छत्तीसगढ़ की राजधानी में स्वामी विवेकानंद की याद में राष्ट्रीय स्मारक बनाया जाएगा। यह बातें 30 साल पहले चर्चा में आईं थी, मगर अब यह सच साबित होती दिख रही हैं। अब तक किसी न किसी वजह से स्मारक बनाने का काम रुका ही हुआ था। दरअसल रायपुर में जहां स्वामी विवेकानंद रहे थे, वह स्थान रायबहादुर भूतनाथ डे चेरिटेबल ट्रस्ट  के अधीन है। उचित व्यवस्थापन तय न हो पाने की सूरत में यहां कुछ भी काम अब तक नहीं हो सका था।

मगर अब 2 जनवरी को हुए कैबिनेट के फैसले में ट्रस्ट को जमीन और भवन देने के मुद्दे पर निर्णय लिया गया। ट्रस्ट को नगर निगम के पास मौजूद भूमि में स्थान दिया जाएगा। वर्तमान में ट्रस्ट स्कूल भी चला रहा है, इन्हें नया स्कूल भी बनाकर दिया जाएगा ताकि बच्चों की पढ़ाई का नुकसान न हो।

मौजूदा स्थिति

जिला प्रशासन और ट्रस्ट से मिली जानकारी के मुताबिक ट्रस्ट को जमीन दिए जाने को लेकर हर स्तर पर बात-चीत हो चुकी है। जल्द ही इसकी प्रक्रिया भी शुरू की जाएगी। ट्रस्ट के राजेंद्र बैनर्जी ने बताया कि यह हमारे लिए गौरव की बात है कि जहां स्वामी जी रहे, उस जगह पर सरकार स्मारक बनाना चाहती है। हमनें अपनी शर्तें सरकार के सामने रखीं हैं, जिस पर वह राजी भी हैं। हमें उन्हें जगह देने में कोई समस्या नहीं है।

यह होगा स्मारक में

संस्कृति विभाग से मिली जानकारी के मुताबिक यहां स्वामी विवेकानंद से जुड़ी पुस्तकें, उनके रायपुर आने की घटनाओं का चित्रण, उनके भाषण, विवेकानंद के अनमोल विचार और उनके जीवन की महत्वपूर्ण घटनाओं को दिखाती गैलेरी बनाई जा सकती है। चूंकि फिल्हाल भवन को खाली कराए जाने की प्रक्रिया होनी है, इसके बाद यह प्रोजेक्ट और भी चीजों को शामिल कर शुरू किया जाएगा। भवन के खाली होने के बाद इसके ढांचे को पुरातत्व विभाग के एक्सपर्ट वैसे ही सहेजेंगे जैसा यह सालों पहले हुआ करता था।

रायपुर में स्वामी विवेकानंद

रायपुर में स्वामी विवेकानंद ने सन 1877 से 1879 के बीच अपना बचपन बिताया था। रायपुर का एयरपोर्ट हो या प्रमुख तालाब यह विवेकानंद के नाम पर किए जाने के पीछे की असल वजह है। रायपुर के रामकृष्ण मिशन से मिली जानकारी के मुताबिक सन् 1877 ई. में स्वामी विवेकानंद रायपुर आये । तब उनकी आयु 14 वर्ष की थी और वे मेट्रोपोलिटन विद्यालय की तीसरी श्रेणी (आज की आठवीं कक्षा के समकक्ष) में पढ़ रहे थे । उनके पिता विश्वनाथ दत्त तब अपने  काम की वजह से तब रायपुर में ही रह रहे थे ।

विवेकानंद अपने छोटे भाई महेन्द्र, बहन जोगेन्द्रबाला तथा माता भुवनेश्वरी देवी के साथ कलकत्ता से रायपुर के लिये रवाना हुए । तब ट्रेन की सुविधा रायपुर तक नहीं थी।  माना जाता है कि तब वह जबलपुर तक ट्रेन से आए इसके बाद रायपुर बैलगाड़ी से आए। इस यात्रा में 15 दिनों का वक्त लगा।

रायपुर में स्वामी विवेकानंद ने यह सीखा

कहा जाता है कि इस यात्रा में भी विवेकानंद ने बहुत कुछ सीखा। रायपुर में अच्छा स्कूल नहीं था । इसलिये विवेकानंद पिता से ही पढ़ा करते थे। विवेकानंद अपने पिता के साथ रायपुर के भवन में खाना भी पकाया करते थे। रायपुर में उन्होंने शतरंज खेलना भी सीख लिया, फिर यहीं विश्वनाथ बाबू ने विवेकानंद को संगीत की पहली शिक्षा दी । विवेकानंद को बचपन से ही संगीत से बेहद लगाव था, उनके पिता भी संगीत में बेहद अच्छे कलाकार थे। इस वजह से आए दिन शाम के वक्त यहां संगीत के रियाज से गलियां गूंजा करती थीं। विवेकानंद आगे चलकर अच्छे गायक भी बने।

मिली थी चांदी की घड़ी

करीब डेढ़ वर्ष रायपुर में रहकर विश्वनाथ दत्त सपरिवार कलकत्ता लौट आये। लंबे समय तक स्कूल नहीं जाने की वजह से शिक्षकों ने विवेकानंद को पहले तो स्कूल में एडमिशन नहीं दिया।  कुछ वक्त इस घटना से वह निराश रहे, लेकिन बाद में उन्हें विशेष आग्रह पर स्कूल में दाखिला मिला उन्होंने स्कूल में परीक्षा न सिर्फ पास की बल्कि स्कूल में टॉप किया था। इस पर स्वामी विवेकानंद के पिता ने उन्हें तोहफे में उस जमाने में चांदी की घड़ी दी थी।

दर्रेकसा के पास स्थित गुफा में स्वामीजी को पहली बार हुई थी आध्यात्मिक अनुभूति

स्वामीजी  को दर्रेकसा के पास स्थित गुफा में पहली बार आध्यात्मिक अनुभूति हुई थी। राजनांदगांव से करीब 77 किमी दूर छत्तीसगढ़-महाराष्ट्र की सीमा पर यह गुफा हाजरा फाॅल के पास है। अब इसमें से अप लाइन की ट्रेन गुजरती है, जो हावड़ा-मुंबई रेलवे लाइन पर स्थित है। इसी गुफा से 14 वर्ष की आयु में नरेंद्र (स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम) बैलगाड़ी से गुजरे थे। यह 1877 की बात है।

नरेंद्र परिवार के साथ यात्रा पर थे। इस अनुभूति का जिक्र विवेकानंद के कई पत्रों व संदर्भों में उल्लेखित है। संदर्भों के अनुसार नरेंद्र पिता बैरिस्टर विश्वनाथ दत्त व परिजन के साथ बैलगाड़ी पर नागपुर से रायपुर जा रहे थे। देबाशीष चितरंजन रॉय ने अपनी किताब ‘जर्नी ऑफ स्वामी विवेकानंद टू रायपुर एंड हिज फर्स्ट ट्रांस’ में इस गुफा में स्वामीजी को पहली आध्यात्मिक अनुभूति होने के बारे में लिखा है। स्वामीजी के अनुयायी इस स्थान को प्रथम भाव समाधि स्थल के रूप में जानते हैं। रामकृष्ण आश्रम से जुड़े लोग और स्वामी विवेकानंद के अनुयायी, साधक बड़ी संख्या में यहां दर्शन के लिए आते हैं।

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