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पहले रतनजोत से बायोडीजल निकालने के लिए 300 करोड़ खर्च किये और अब 140 करोड़ खर्च करके धान से निकालेंगे बायोफ्यूल 

रायपुर (एजेंसी) | जहाँ एक और चावल नहीं होने से अन्नपूर्णा जैसी योजना को बंद कर दिया वही दूसरी ओर राज्य सरकार 140 करोड़ रूपये खर्च करके धन से बायो फ्यूल बनाने की योजना पर विचार कर रही है। क्योंकि धान की खरीदी कीमत और इथेनाल की बिक्री की कीमत में ज्यादा अंतर नहीं है। कहीं इस योजना का हश्र भी रतनजोत जैसा न हो जाए।

करीब साढ़े तीन सौ करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी रतनजोत से बायोडीजल निकालने की योजना फेल हुई। अब धान और कनकी से बायोफ्यूल बनाने की प्लानिंग चल रही है। इसके लिए भी 125 से 140 करोड़ रुपए खर्च कर नया प्लांट लगाया जाएगा। इससे पहले रतनजोत से बायोडीजल बनाने के लिए 50 लाख का प्लांट लगाया गया था। दूसरी तरफ अफसर इस बात को लेकर सशंकित भी हैं कि कहीं इस योजना का हश्र भी रतनजोत जैसा न हो जाए।

2019-20 में करीब 100 लाख टन धान की खरीदी का लक्ष्य

छत्तीसगढ़ सरकार ने 2018-19 में 80 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा था। सरकार यह मानकर चल रही है कि 2019-20 में करीब 100 लाख टन धान की खरीदी होगी। धान के अधिक उत्पादन और उसकी उपयोगिता नहीं होने के कारण इससे बायोफ्यूल बनाने पर विचार किया गया। प्रदेश में भंडारण की सुविधा न होने से हर साल लगभग 20 फीसदी धान खराब हो जाता है जिसे नान और एफसीआई के जरिए शराब कंपनियां खरीद लेती हैं। अब चूंकि सरकार शराब बंदी की ओर जा रही है तो इस धान का उपयोग बायोफ्यूल बनाने में करने की योजना बनाई जा रही है।

धान के साथ गन्ने से भी बायोफ्यूल बनाने पर विचार किया जा रहा है। दरअसल कुछ दिन पहले ही छत्तीसगढ़ बायोफ्यूल विकास प्राधिकरण ने कृषि उत्पाद से बायोफ्यूल बनाने की योजना पर एक कार्यशाला आयोजित की थी। इसमें देशभर के विषय विशेषज्ञों को भी आमंत्रित किया गया था। इसमें इसी बात पर जोर दिया गया।

इस सोच के आधार पर तैयारी

बायोफ्यूल के विकास के लिए देश-प्रदेश में कृषि वानिकी मॉडल पर काम करने बनाए गए प्लान के आधार पर इस सोंच को विकसित किया जा रहा है। किसानों को लाभ दिलाने के उद्देश्य से इसकी प्रोसेसिंग पर ध्यान दिया जा रहा है। इसके लिए छोटे-छोटे समूह में किसान उत्पादक संस्था बनाने की भी प्लानिंग है जिसमें किसान ऑयल कम्पनियां और सरकार साथ मिलकर काम कर सके।

विशेषज्ञों की मानें तो यह योजना सरकार के लिए घाटे का सौदा

विषय विशेषज्ञों का कहना है कि यह एक महंगी योजना है। इससे बायोफ्यूल का उत्पादन भी किया जा सकता है लेकिन सरकार जितनी कीमत पर धान खरीदेगी उससे कम कीमत पर इसके प्रोडक्ट की बिक्री होगी। क्योंकि सरकार अभी 25 रुपए प्रति किलो में धान खरीद रही है और एक किलो धान या चावल से आधा लीटर इथेनाल बनेगा। यानि 25 रुपए का धान या 35 रुपए के चावल से 25 से 30 रुपए का आधा लीटर इथेनाल उत्पादन होगा। जबकि इसमें अभी धान और चावल का प्रोसेसिंग शुल्क जोड़ा ही नहीं गया है। इसलिए यह सरकार के लिए घाटे का सौदा हो सकती है।

रतनजोत से तेल निकालने पर प्रति लीटर 9000 रुपए खर्च किए

पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने दावा किया था कि 2014 तक छत्तीसगढ़ डीजल के मामले में आत्मनिर्भर हो जाएगा। इसके लिए राज्य में 1.65 लाख हेक्टेयर जमीन पर रतनजोत लगाए गए थे। रतनजोत के बीज से प्रतिलीटर डीजल उत्पादन पर 9 हजार रुपए खर्च किए गए। प्रदेश को डीजल के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के लिए 12 साल में करीब 300 करोड़ खर्च कर रतनजोत के पौधे रोपे गए। कवर्धा जिले के राजानांगांव में तो 10 लाख का प्लांट शुरू ही नहीं किया जा सका। इस तरह यह याेजना फेल हो चुकी है।

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