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व्यापार शुरू करने 300 से ज्यादा आवेदन आए, इंस्पेक्टरों ने अभी तक पड़ताल ही नहीं की, 46 युवाओं का 23 करोड़ लोन अटका

रायपुर (एजेंसी) | छत्तीसगढ़ शासन द्वारा खुद का व्यापार शुरू करने के लिए योजना में इस बार 300 से ज्यादा आवेदन आए। इसमें लोन के लिए आवेदन करने वाले जरूरतमंदो की जांच करने की जिम्मेदारी समाज कल्याण विभाग की है। लेकिन हकीकत ये है कि हर ब्लॉक में एक ही इंस्पेक्टर का पद स्वीकृत हैं। जबकि अभनपुर, आरंग, धरसीवा में ही इंस्पेक्टर नियुक्त हैं। जबकि तिल्दा ब्लॉक में एक पद खाली है।




इसलिए किए गए आवेदनों की जांच की जिम्मेदारी धरसीवा और आरंग के इंस्पेक्टरों को ही निभानी पड़ रही है। इतना ही नहीं जांच के बाद छत्तीसगढ़ नि:शक्त जन एवं विकास निगम के पास जाने के बाद भी 10 से ज्यादा आवेदन फर्जी पाए गए। जिससे लगभग  46 युवाओं का 23 करोड़ लोन अटक गया है।

कई फर्जी प्रमाण-पत्र भी मिलते है, जिसकी जांचा के बाद ही लोन स्वीकृत किए जाते है 

सच्चाई यह है कि ब्लॉक लेबल पर इंस्पेक्टरों को व्यावसायिक लोन लेने की प्रक्रिया में दिए जाने वाले डॉक्यूमेंट की जांच के बाद भी खामियां पकड़ में नहीं आ रही है। नतीजा इंस्पेक्टर की जांच के रिकार्ड और दिए गए दिव्यांगता सर्टिफिकेट में खामी पाई जा रही है। विभाग ने 18 साल में 25 से ज्यादा ऐसे आवेदन निरस्त किए हैं। जिसमें व्यावसायिक लोन के लिए दिव्यांगता संबंधी दिए गए सर्टिफिकेट फर्जी पाए गए।

इसलिए दिए जाते हैं लोन

शासन ऐसे युवा बेरोजगारों को खुद का व्यवसाय शुरू करने लोन 2004-05 से दे रही है। ताकि 40% दिव्यांगता रखने वाले युवाओं को काम दिया जा सके। इसके लिए आवेदन करने वालों को सिविल सर्जन से प्रमाणित सर्टिफिकेट, गारंटर जिसके पास लोन में चाही गई राशि के समकक्ष प्रॉपर्टी हो। आवेदक के परिवार की शपथ पत्र में सहमति जरूरी है। आवेदक प्रारंभिक शर्तें ही पूरी नहीं कर पाते।

जल्द ही रुके लोन स्वीकृत होंगे

लोन देने की प्रक्रिया में समय लगता है। प्राथमिक लेवल पर दी गई जानकारी की जांच के बाद आवेदन को चिकित्सकों की समिति के पास भेजा जाता है। उनकी मंजूरी के बाद ही प्रोसेस किया जाता है। जल्द ही रूके हुए लोन को स्वीकृति दी जाएगी।

जिला स्तर पर भी लापरवाही

व्यावसायिक लोन लेने के लिए आवेदनों की प्राथमिक जांच करके इंस्पेक्टर को देने का नियम है। जबकि 5 से 6 महीने में आए आवेदनों को एक साथ ब्लॉक लेवल पर भेजा जाता है। इससे इंस्पेक्टरों पर दबाव बढ़ता है। जबकि आवेदकों की ओर से दिए गए दस्तावेजों की जांच में ही गड़बड़ी की जाती है। इसलिए इंस्पेक्टर को स्पॉट और व्यवसाय के लिए तय बजट की सच्चाई जांचने में देर होती है।



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