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अंबेडकर में भर्ती डेंगू के 43 मरीजों में दुर्ग-भिलाई के 25 मरीज, बेड फुल होने से लौटे मरीज़

रायपुर (एजेंसी) | भिलाई-दुर्ग में डेंगू के कहर का नतीजा है कि प्रदेश के सबसे बड़े अंबेडकर अस्पताल के आइसोलेटेड वार्ड में बेड फुल हो गए हैं। इससे मरीजों को बिना इलाज कराए लौटना पड़ रहा है। बुधवार को डेंगू वार्ड में 43 मरीज भर्ती थे। इनमें 25 मरीज दुर्ग-भिलाई के रहने वाले हैं।

अस्पताल प्रबंधन का दावा है कि कई मरीज इलाज कराने के बजाय निजी अस्पताल चले जाते हैं। ऐसे मरीजों की सूचना पुलिस को भेजी जा रही है।कालीनगर रायपुर की 15 वर्षीय स्प्रिहा सिन्हा को बुखार के साथ जोड़ों में दर्द हो रहा था। वह डेंगू का इलाज कराने के लिए अंबेडकर अस्पताल पहुंची थी। उसे ट्रामा सेंटर भेजा गया। वहां से जब आइसोलेटेड वार्ड भेजा गया तो भर्ती होने के लिए बेड नहीं था।




स्टाफ से इस पर बहस भी हुई। जब बेड नहीं मिला तो परिजन स्प्रिहा को निजी अस्पताल लेकर चले गए। महासमुंद की 15 वर्षीय वंशिका चांडक भी बेड नहीं मिलने से बिना इलाज कराए निजी अस्पताल चली गई। उसे महासमुंद के निजी लैब में डेंगू पॉजीटिव की पुष्टि हुई थी। इसलिए बेहतर इलाज के लिए अंबेडकर अस्पताल पहुंची थी। अब दोनों मरीजों के चले जाने से प्रबंधन के इलाज की व्यवस्था पर कई सवाल उठ रहे हैं। वर्तमान में 43 मरीज जो भर्ती हैं, उनमें 32 की पॉजीटिव रिपोर्ट है। बाकी मरीजों का ब्लड सैंपल जांच के लिए मेडिकल कॉलेज भेजा गया है। इन मरीजों में डेंगू के लक्षण हैं। भिलाई से जितने मरीज आए हैं, सभी की रिपोर्ट पॉजीटिव है। वार्ड में भिलाई के तीन छात्र समर्थ दीक्षित 18 वर्ष, प्रशांत पांडेय 20 वर्ष व सोमेश यादव 22 वर्ष भर्ती है। तीनों छात्र खुर्सीपार इलाके के रहने वाले हैं। वार्ड में रायपुर के अलावा राजनांदगांव, अंबिकापुर, धमतरी, कोरिया, कोरबा, बेमेतरा, कसडोल व सारंगढ़ के मरीजों का इलाज भी चल रहा है।

200 मीटर तक उड़ सकता है डेंगू का मच्छर 

डेंगू का मच्छर एडीस 200 मीटर तक उड़ सकता है। इसलिए जहां पर डेंगू बीमारी फैला रहता है, वहां आसपास खतरा बढ़ जाता है। दूसरे शहरों में यह बीमारी संक्रमित मरीज से फैलती है। अथवा उस शहर या इलाके में डेंगू का मच्छर हो। डॉक्टरों के अनुसार डेंगू के मरीज को काटने के बाद यह मच्छर किसी को भी बीमार कर सकता है। अंबेडकर अस्पताल में शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. वीरेंद्र कुर्रे के अनुसार पहले से बीमार बच्चों के लिए यह बीमारी खतरनाक हो जाती है। यहां अभी तक किसी बच्चे की मौत नहीं हुई है।



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