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दंतेवाड़ा उपचुनाव: गांवों में लोगों के सवाल-4 महीना पहले तो वोट डाले थे, अब फिर क्यों! अंदरूनी गांवों में चुनाव को लेकर ज्यादातर मतदाताओं को कोई जानकारी नहीं

दंतेवाड़ा (एजेंसी) | छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में उपचुनाव को लेकर राजनीतिक दल जोर-आजमाइश में लगे हैं, लेकिन मुख्य सड़क छोड़ दें तो अंदरूनी गांवों में चुनाव को लेकर कोई खास उत्साह नहीं दिख रहा है। मतदाता या तो मुद्दों को लेकर मौन हैं या उदासीन बने हैं। दंतेवाड़ा से 20 किमी दूर जिस मेटापाल में चार दिन पहले 16 सितंबर को सीएम भूपेश बघेल सभा लेकर लौटे और उसी जगह पर पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह की सभा को अनुमति नहीं मिली, वहीं साप्ताहिक बाजार में खास चुनावी उत्सुकता नहीं दिखी।

बाजार के बाहर तोरण और पोस्टर, लेकिन मतदान की जानकारी नहीं

दंतेवाड़ा विधानसभा उपचुनाव के लिए शनिवार को प्रचार का अंतिम दिन है। यहां पर 23 सितंबर को मतदान होना है। भास्कर ने वोटरों का मन टटोलने इस बाजार का जायजा लिया। बाजार के बाहर चुनावी चिह्न वाले तोरण और पोस्टर लगे थे। बाजार में कावड़गांव, मेंडोली, जारम, लखापाल, मुस्केल, तोयलंका समेत आसपास के गांवों से ग्रामीण आए थे। मुस्केल से आई महिला कोसी को मतदान के बारे में कोई जानकारी नहीं थी। उसका सवाल था कि अभी तो 4 महीना पहले वोट डाले थे, अब फिर से क्यों वोट डालना होगा?

तोयलंका के मंगड़ू का कहना था कि उसके गांव तक कच्ची सड़क बारिश में दलदल हो गई है। बाहर से कोई आता-जाता भी नहीं। इसलिए चुनाव के बारे में पता नहीं था। बाजार में बेचने के लिए अस्थाई चूल्हे पर मिर्च के भजिए तल रही महिला सोनमती का कहना था कि दो सप्ताह से बाजार में एक-दो प्रचार गाड़ी देख रही हैं। 23 सितंबर को वोट देना है, ऐसा बता रहे हैं। किसे देना है, अभी सोचा नहीं है। बीते सप्ताह इसी बाजार में जादूगर ने चुनावी शो भी दिखाया था।

हाट-बाजारों के जरिए साधने की कोशिश

हाट-बाजारों पर उम्मीदवारों की नजर है। दरअसल, साप्ताहिक हाट-बाजार दक्षिण बस्तर की ग्रामीण जीवन शैली का अहम हिस्सा हैं, जहां दूर-दराज के गांवों से ग्रामीण वनोपज की बिक्री व दैनिक जरूरत की चीजों की खरीदी के लिए पहुंचते हैं, और ये हाट-बाजार मेल-मिलाप का जरिया भी हैं। इन जगहों पर सप्ताह में एक दिन ग्रामीण जुटते हैं। इस वजह से राजनीतिक दल इन हाट-बाजारों में आने वाले ग्रामीणों तक अपने उम्मीदवार व चुनाव चिह्न के बारे में जानकारी पहुंचाने की कोशिश में जुटे हुए हैं।

ज्यादातर साप्ताहिक हाट-बाजारों में बीते डेढ़ दशक के दौरान नक्सली हमलों में फोर्स को काफी नुकसान उठाना पड़ा है। मेन रोड पर स्थित नकुलनार, कटेकल्याण, पालनार, दंतेवाड़ा, तुमनार के साप्ताहिक बाजार में जवानों पर कई नक्सली हमले हो चुके हैं। इसके अलावा अंदरूनी इलाकों में भरने वाले हाट-बाजारों में ज्यादा सावधानी बरतने की जरूरत पड़ती है। हाट-बाजारों में अब चुनाव प्रचार का तरीका बदल गया है। अब पहले की तरह प्रचार गाड़ियां बेखौफ इन बाजारों में नहीं पहुंचती हैं, बल्कि सीमित समय तक ही फोर्स की मौजूदगी में प्रचार गाड़ियां रहती हैं और लौट आती हैं।

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