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#BookReview अघोरी बाबा की गीता, लेखक – अभिनन्दन शर्मा ‘आइये, अघोरी बाबा बुला रहे हैं’

यूँ तो आज भी पुस्तक प्रेमियों की संख्या अधिक नहीं है, तिस पर ऐसे विषयों के पाठकों का अपना एक विशेष वर्ग है। मेरा मानना है कि यदि अपवाद को त्याग दिया जाए तो इन्हें पढ़ने के लिए स्पेसिफिक मूड की भी जरूरत पड़ती है। सामान्यतया आज के भौतिक युग की आपाधापी में ज्ञानार्जन के लिए समय मनोरंजन के बाद आवंटित होता है। आज जो किताब पढ़ी उसके लेखक अभिनन्दन शर्मा के अनुसार उन्होंने उसी ज्ञान को मनोरंजन की चाशनी में लपेट कर परोसने का प्रयास है, ताकि अधिकाधिक लोग इस ओर आकर्षित हो सकें।

इस उपन्यास के मुख्य पात्र के पास भारतीय शास्त्रों और ख़ास तौर से भगवद्गीता से सम्बन्धित कुछ संशय हैं, किन्तु उन संशयों को दूर करने वाला कोई नहीं है। अनायास उसे एक अघोरी बाबा मिलते हैं, जो उसे भगवद्गीता का गूढ़ रहस्य, आज की जीवन-शैली के हिसाब से समझाने की कोशिश करते हैं।

किन्तु जब बाबा देखते हैं कि अभी तो इसे भारतीय शास्त्रों का क-ख-ग भी नहीं पता, तो वो अंतर्धान हो जाते हैं। अपनी जिज्ञासा को लिए, वह मुख्य पात्र, अन्य किरदारों – एक भिखारी, एक मेहतर और एक वेश्या से मिलता है, जो उसे भगवद्गीता और शास्त्रों में निहित, व्याकरण, योग, अद्वैत, ‘साइकोलॉजी’ आदि का अद्भुत ज्ञान देते हैं। कैसे एक आम इन्सान को आज के जीवन के सन्दर्भ में एक भिखारी से, एक मेहतर से और एक वेश्या से शास्त्रों का गूढ़ ज्ञान मिला?

कैसे इस ज्ञान से उसकी जीवन-शैली में परिवर्तन आया? क्यों उसे ऐसे लगा कि शास्त्रों का ज्ञान पुराना नहीं है, बल्कि आज भी यह जीवन में उतना ही उपयोगी है, जितना शायद पहले कभी रहा होगा। उसे भारतीय शास्त्रों के कौन से रहस्य पता चले, जिन्होंने उसके जीवन में आमूलचूल परिवर्तन कर दिया? अंत में जान लें कि इस कहानी के मुख्य पात्र खुद आप हैं; आप ही इस किताब के पाठक हैं और आप ही इसके मुख्य पात्र भी। जाइये. अघोरी बाबा बुला रहे हैं |

अघोरी बाबा की गीता, एनी बुक्स रेड ग्रेब बुक्स द्वारा प्रकाशित है। लेखक ने इस पुस्तक की अभिप्रेरणा के रूप में ‘आनन्द जी पटना वाले’ का नाम लिया है, जिनकी फेसबुक पोस्टों में गीता के ज्ञान को सरलीकृत कर के प्रस्तुत किया जाता है। जो इतने विनम्र हैं कि इतनी शानदार व्याख्याओं को स्वयं केजी स्तर की मानते हुए पीएचडी लेवल के लिए मूल श्रीमद्भागवत गीता के अध्ययन का ही आग्रह करते हैं। लेखक शर्मा जी कथन है कि उन्होंने उसी गीता के एक एक श्लोक और शास्त्रों के गूढ़ ज्ञान को रोचकता के साथ कथात्मक रूप में ढाल दिया है।

लेखक ने 196 पृष्ठीय इस कथा को कई जगह उपन्यास कहा है। जिसकी अनुक्रमणिका में 5 पड़ाव दिखाई पड़ते हैं जिन्हें लेखक ने अघोरी बाबा की गीता, एक चातक की प्यास, नटराज का नर्तन, तन को जोगी सब करे और मन का फिराय जोगी, मनका फिराय इत्यादि नाम दिए हैं।

कथानक के अनुसार लेखक को कोई चमत्कारी अघोरी बाबा मिलते हैं जिनके चमत्कारों के पाश में बंध कर वो उनके प्रति आकर्षित होता चला जाता है। अघोरी बाबा लेखक को गीता का ज्ञान देना प्रारम्भ करते हैं, लेखक को भिखारी, मेहतर और वेश्या के पास ज्ञान लेने भेजते हैं। पूरी कहानी लेखक के इनके पास जाने और इनके द्वारा ज्ञान बांटने की ही है।

कथानक में अधिकतर संवाद वही हैं जो गीता या अन्य धर्मग्रंथों में हम पढ़ चुके हैं, अतः वो बहुत नए से नहीं लगते। काल्पनिकता के लिए अधिक स्थान नहीं बचता पर भिखारी और लेखक का प्रसंग वाकई रोचक और बेहतरीन बन पड़ा है। गीता के सभी श्लोकों का तो नहीं पर कुछ श्लोकों का सरलीकृत रूप इसमें देखने को अवश्य मिलेगा। किंतु जब गीता की बात करते करते लेखक श्रीकृष्ण द्वारा उद्धव के भ्रम को दूर करने के प्रसंग में रीतिकालीन कवि रत्नाकर के काव्य और उनकी व्याख्या करने लगते हैं तो ये थोड़ा खटकता है।

इसे प्रेम शब्द निरूपण के लिए आवश्यक कह कर टाला नहीं जा सकता क्योंकि लेखक यहाँ कवि के चमत्कार, उक्ति वैचित्र्य और वर्तमान कवियों के साथ उसकी अनावश्यक तुलना कर उलझता प्रतीत होता है। भाषा के स्तर पर लेखक अभिनन्दन शर्मा अच्छे कहे जा सकते हैं। कुछेक स्थानों को छोड़ अधिकतर भाषा पात्रानुकूल ही है। भाषा के मामले में असहज होने पर उन्होंने चमत्कार का प्रश्रय लिया है। वेश्या और भिखारी द्वारा अपनी मूल भाषा को त्याग लेखक की हिंग्लिश भाषा में संवाद करना, लेखक ने चतुराई से इसी चमत्कार के आवरण में छुपा लिया है।

शेष उन्होंने गीता से जो भी उठाया है वो किसी भी प्रकार के प्रश्नों से परे और बेहतरीन है ही। लेखक के साथ हुए अधिकांश संवाद व्याख्यान शैली में हैं अतः मेरा सुझाव है कि यथासंभव एक ही बार में पढ़ने का प्रयास किया जाना चाहिए, क्योंकि टुकड़ों में पढ़े जाने पर पढ़ने में गत्यावरोध आने का भय रहेगा। आधुनिक लेखकों में आध्यात्म पर लिखने वाले गिनती के ही होंगे। इस कारण भी अभिनन्दन शर्मा का यह प्रयास विशेष हो जाता है, ऐसे प्रयासों का यथासंभव प्रोत्साहन किया जाना चाहिए। अघोरी बाबा की गीता जरूर पढ़ें। इसका दूसरा भाग भी अब उपलब्ध है।

‘अघोरी बाबा की गीता’ का कुछ अंश

रोजाना की तरह मैं अपने आफिस से घर जा रहा था । एक हाथ में स्टीयरिंग, एक हाथ मे मोबाइल और कार में भजन, जैसा रोज होता है । अचानक मेरे अवचेतन मस्तिष्क ने कार में जोरदार ब्रेक लगाये । सामने देखा तो एक बाबा, लंबी जटाओं वाले, भगवा कपड़े पहने, कार के सामने खड़े थे । उन्होंने जोर से कार पर हाथ मारा और बोले – मूर्ख, ध्यान कहाँ हैं तेरा ? और यह कहकर आगे बढ़ गए । मैने बोनट को देखा तो उस ओर एक बड़ा हाथ के पंजे का निशान बना हुआ था ,शायद धूल के हटने से उनके पंजे का निशान छप गया था ।

घर आया, बेटी ने पानी दिया और फिर थोड़ी देर बाद श्रीमती जी ने खाना परोस दिया, पर मेरे दिमाग मे उस अघोरीनुमा साधु का चेहरा और उसका वाक्य, ध्यान किधर है तेरा, ही घूम रहा था । रोजाना की दिनचर्या के बाद मैं थक कर सोने चला गया।
रात करीब 2 बजे के आसपास बेल बजी । जैसा कि हमेशा होता है, आवाज आने पर मेरी ही नींद पहले खुलती है, तब भी मेरी नींद ही खुली । इतनी रात को कौन आया होगा, हाल की लाइट जला कर, सोचते सोचते दरवाजे पर पहुंचा | झाँक कर देखा, कुछ दिख नहीं रहा था |

मैंने थोडा जोर से पूछा – कौन ? दूसरी तरफ से आवाज आयी – तेरा ध्यान किधर है, दरवाजा क्यों नहीं खोलता ! आवाज कान में क्या पड़ी, जैसे किसी ने गर्म तेल डाल दिया हो ! पूरे शरीर में पीठ के पीछे से एक सिहरन गर्दन तक दौड़ गयी | ये तो उसी बाबा की आवाज है ! मेरे हाथो ने अपने आप दरवाज खोल दिया | दरवाजे पर वही अघोरीनुमा बाबा खड़े थे | लम्बी लम्बी जटाएं, भगवा कपडे, गले में मोटे रुद्राक्ष की माला, आँखों में तेज और चेहरे पर अजीब सी मुस्कान | बिना कोई बात कहे, वो अन्दर घुस के आकर सामने सोफे पर पालती मार कर बैठ गए |

मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था, इतनी रात को ये कैसे ऊपर आ गए ? बाहर चौकीदार ने इनको रोका नहीं ? इस समय तो गेट भी अन्दर से बंद होता है, ये ऊपर कैसे आ गए ? अचानक उनकी फिर से कडक आवाज ने मेरा ध्यान तोडा – क्या हुआ, क्या सोच रहा है ? मेरे मुंह से कुछ निकल नहीं रहा था, कुछ समझ नहीं आ रहा था, धीरे से मुंह से बस इतना निकला – आप ! इस से आगे में वाक्य में कुछ और जोड़ पाता, उन्होंने पुछा – क्यों, दूसरी गीता नहीं चाहिए ? मेरी तो कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था कि ये हो क्या रहा है, मेरे मुंह से धीरे से बस इतना ही निकला – दूसरी गीता !!!

तूने दूसरी गीता नहीं मांगी थी, दो दिन पहले ? अचानक मेरे दिमाग में आया कि मैंने दो दिन पहले फेसबुक पर एक पोस्ट डाली थी, जिसमें मैंने लिखा था – “कर्म कर फल की चिंता मत करो – इति गीता ज्ञानम, पर बिना लक्ष्य संधान के बाण नही छोड़ा जाता प्रभु, कर्म करने के लिए हेतु तो चाहिए ही चाहिए । बिना हेतु कोई कर्म नही हो सकता, ये अकाट्य सत्य है । तब हेतु हो,लक्ष्य हो पर फल की चिंता न हो ,साला इसको साधने के लिए एक गीता और चाहिए, महाराज । कब दे रियो हो, दूसरी गीता ? “ तो क्या ये, गीता ही समझाने आये हैं ! अचानक मेरे दिमाग में कौंधा, कहीं ऐसा तो नहीं, ईश्वर ने इन बाबा को ही भेज दिया हो, मेरे गीता के संशय को दूर करने के लिए ! अन्दर से एकदम से बड़ी ख़ुशी सी हुई |

इस समय बाबा को लेकर कोई सवाल दिमाग में नहीं आ रहा था | अचानक बेडरूम का दरवाजा खुला और श्रीमती जी प्रकट हुई और बोली – क्या हो रहा है, यहाँ क्यों बैठे हो ? मैंने उसको हाथ के इशारे से जैसे ही बताया कि देखो बाबा और गर्दन घुमाई तो वहां कोई भी नहीं था | सारी ख़ुशी एकदम से काफूर हो गयी | एकदम से ऐसा लगा, जैसे मैंने कोई सपना देखा हो | श्रीमती जी मेरी तरफ ऐसे घूर रही थी, जैसे वो मेरी बेटी को घूरती है, जब वो स्कूल न जाने का कोई बहाना बनाती है | मेरे मुंह से यही निकला – कुछ नहीं, बस नींद नहीं आ रही थी, तो थोड़ी देर के लिए बाहर आकर बैठ गया था | श्रीमती जी ने लाइट बंद कर दी, जिसका एक ही मतलब था | सोने गया, तो आँखों में नींद कम और प्रश्न ज्यादा घूम रहे थे !

लेखक के बारे में

सन् 1982 में उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ शहर में जन्मे अभिनन्दन शर्मा, डॉ. अशोक शर्मा के सुपुत्र हैं। आपकी 12वीं तक की शिक्षा हाथरस में सम्पन्न हुई और 2005 में आईटीएम कॉलेज, ग्वालियर से आपने इन्जिनीयरिंग (इलेक्ट्रॉनिक्स एवं इंस्ट्रूमेंटेशन) की शिक्षा प्राप्त की। विभिन्न कम्पनियों में विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएँ देने के बाद आप वर्तमान में, दिल्ली में स्थित जापानी कम्पनी में, असिस्टेंट मैनेजर (सेल्स) के पद पर कार्यरत हैं।

अभिनन्दन शर्मा अपने पिताजी द्वारा स्थापित ‘पंडित बैजनाथ शर्मा प्राच्य विद्या शोध संस्थान, हाथरस’ में अपने भाइयों के साथ मिलकर संरक्षक की भूमिका निभा रहे हैं और स्वयं सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार हेतु, मौलिक लेख व विचार, सोशल मीडिया व अन्य माध्यम से साझा करते रहते हैं। आप अपने पेसबुक पेज ‘शास्त्र-ज्ञान’ पर नियमित लेख लिखते हैं और इसी नाम से एक ब्लॉग https://shastragyan.in भी बना रखा है। ‘अघोरी बाबा की गीता’ उपन्यास-शृंखला का भाग – १ व भाग – २ प्रकाशित है, आगे इसके कई खण्ड आयेंगे।

अघोरी बाबा की गीता, भाग – १

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अघोरी बाबा की गीता, भाग – २

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